Article Body
मणिपुर आज अपने आधुनिक इतिहास के सबसे कठिन दौरों में से एक का सामना कर रहा है। पिछले तीन वर्षों में राज्य ने जातीय संघर्ष, बड़े पैमाने पर विस्थापन, सामाजिक अविश्वास और सुरक्षा संबंधी गंभीर चुनौतियों को देखा है। अवैध प्रवासन को लेकर चिंताएँ बढ़ी हैं, सीमावर्ती क्षेत्रों में असुरक्षा की भावना गहरी हुई है और अनेक लोगों को यह महसूस हुआ है कि उनकी आवाज़ राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त रूप से नहीं सुनी जा रही। ऐसे समय में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि दिल्ली में मणिपुर का सबसे प्रभावी प्रतिनिधि कौन रहा है। यदि पिछले छह वर्षों के संसदीय रिकॉर्ड और जनसरोकारों के आधार पर इस प्रश्न का उत्तर खोजा जाए, तो महाराजा Leishemba Sanajaoba का नाम प्रमुखता से सामने आता है।
18 जून 2026 को होने वाले राज्यसभा चुनाव के साथ उनका कार्यकाल समाप्त होने जा रहा है। ऐसे में चर्चा केवल इस बात की नहीं होनी चाहिए कि उन्हें दूसरा कार्यकाल मिलना चाहिए या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या मणिपुर वर्तमान परिस्थितियों में ऐसे प्रतिनिधि को खोने का जोखिम उठा सकता है जिसने लगातार और बिना किसी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा के राज्य की आवाज़ को राष्ट्रीय मंच पर उठाया हो।
साल 2020 में जब भारतीय जनता पार्टी ने महाराजा Leishemba Sanajaoba को राज्यसभा के लिए नामित किया था, तब कई राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे एक दूरदर्शी निर्णय बताया था। उस समय यह माना गया था कि मणिपुर के राजपरिवार से जुड़े एक सम्मानित व्यक्ति को संसद में भेजना राज्य की सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय राजनीति के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का काम करेगा। छह वर्षों बाद यह कहा जा सकता है कि वह निर्णय केवल प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि परिणाम देने वाला साबित हुआ।
राज्यसभा में उनकी सक्रियता इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। उन्होंने 317 बहसों में भाग लिया, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। यह केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाया। संसद में उनकी उपस्थिति औपचारिक नहीं थी; वे लगातार मणिपुर के मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने का प्रयास करते रहे।
महाराजा Sanajaoba की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे राजनीति में पारंपरिक नेताओं की तरह नहीं आए। राजनीति उनके लिए लक्ष्य नहीं थी, बल्कि सेवा का माध्यम बनी। जो लोग उन्हें लंबे समय से जानते हैं, वे इस बात की पुष्टि करेंगे कि सार्वजनिक जीवन में आने से पहले भी उनकी प्राथमिकता मणिपुर की संस्कृति, इतिहास और सामाजिक समरसता थी। यही कारण है कि सांसद बनने के बाद भी उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन को सत्ता या पद के इर्द-गिर्द केंद्रित नहीं किया।
मणिपुर में 2023 से जारी जातीय हिंसा के दौरान उन्होंने लगातार विस्थापित परिवारों के पुनर्वास, स्थायी शांति और केंद्र सरकार की अधिक सक्रिय भूमिका की मांग की। उन्होंने संसद में यह मुद्दा कई बार उठाया और राज्य के लोगों की पीड़ा को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने का प्रयास किया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के प्रयासों की सराहना की, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि जमीनी स्तर पर ठोस परिणाम दिखाई देने चाहिए। यह एक जिम्मेदार प्रतिनिधि का दृष्टिकोण था, जो समर्थन और जवाबदेही दोनों को साथ लेकर चलता है।
अवैध प्रवासन के मुद्दे पर भी उनका रुख स्पष्ट और मुखर रहा है। उन्होंने बार-बार यह चिंता व्यक्त की कि अवैध म्यांमार और बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान और निष्कासन के बिना जनगणना तथा परिसीमन जैसी प्रक्रियाएं भविष्य में गंभीर सामाजिक और राजनीतिक विवादों को जन्म दे सकती हैं। चाहे कोई उनके विचारों से सहमत हो या असहमत, लेकिन यह तथ्य निर्विवाद है कि उन्होंने उस मुद्दे को संसद में उठाया जिसे मणिपुर के एक बड़े वर्ग द्वारा गंभीर चिंता के रूप में देखा जाता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर भी उन्होंने लगातार आवाज़ उठाई। भारत-म्यांमार सीमा पर बाड़बंदी में आ रही बाधाओं का मुद्दा उन्होंने संसद में प्रमुखता से रखा और केंद्र सरकार से निर्णायक कार्रवाई की मांग की। उनका मानना था कि सीमावर्ती राज्य होने के कारण मणिपुर की सुरक्षा केवल राज्य का विषय नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
हालांकि उनकी पहचान केवल सुरक्षा और राजनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं रही। मणिपुर की संस्कृति और परंपरा के संरक्षण के लिए उनका योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सनामही धर्म को अलग पहचान दिलाने की मांग, मणिपुरी पोनी के संरक्षण की पहल, लोक कलाकारों और सांस्कृतिक संस्थाओं को प्रोत्साहन तथा कांग्लेई माइम थिएटर जैसी संस्थाओं के लिए सहायता सुनिश्चित करना उनके सांस्कृतिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। उन्होंने बार-बार यह संदेश दिया कि विकास और आधुनिकता के साथ-साथ सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है।
विकास के क्षेत्र में भी उनकी प्राथमिकताएं स्पष्ट रही हैं। ग्रामीण मणिपुर में AIIMS जैसी स्वास्थ्य सुविधा स्थापित करने की मांग, जिरीबाम-इम्फाल रेलवे परियोजना को गति देने की आवश्यकता, राष्ट्रीय राजमार्गों की सुरक्षा तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र में मौसम निगरानी तंत्र को मजबूत बनाने जैसे मुद्दों पर उन्होंने लगातार हस्तक्षेप किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि उनका दृष्टिकोण केवल पहचान की राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि विकास और बुनियादी ढांचे पर भी समान रूप से केंद्रित था।
लेकिन किसी भी जनप्रतिनिधि की असली पहचान केवल संसद में दिए गए भाषणों से नहीं होती। उसका मूल्यांकन इस आधार पर भी होता है कि उसने आम लोगों के जीवन में कितना बदलाव लाने का प्रयास किया। प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष के माध्यम से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे अनेक मरीजों को सहायता दिलाने में उनकी सक्रिय भूमिका रही। कैंसर रोगियों, किडनी फेल्योर से पीड़ित लोगों और जरूरतमंद बच्चों के लिए आर्थिक सहायता सुनिश्चित करने के उनके प्रयासों ने अनेक परिवारों को राहत पहुंचाई।
सामाजिक सद्भाव के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। सना कोनुंग में आयोजित होने वाला वार्षिक मेरा हौ चोंगबा उत्सव केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि पहाड़ और घाटी के बीच ऐतिहासिक संबंधों को मजबूत करने का प्रतीक है। इस आयोजन के माध्यम से वे वर्षों से विभिन्न समुदायों के बीच संवाद और विश्वास को बढ़ावा देने का प्रयास करते रहे हैं। ऐसे समय में जब समाज विभाजन और अविश्वास से जूझ रहा हो, इस प्रकार की पहलें विशेष महत्व रखती हैं।
आज जब राज्यसभा चुनाव निकट है, तब यह विचार करना आवश्यक है कि मणिपुर को किस प्रकार के प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है। क्या राज्य को ऐसे नेता की आवश्यकता है जिसने छह वर्षों तक निरंतर प्रदर्शन किया हो, या फिर राजनीतिक समीकरणों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए? यह निर्णय राजनीतिक दलों को करना है, लेकिन जनता और इतिहास दोनों उसके परिणामों का मूल्यांकन करेंगे।
महाराजा Leishemba Sanajaoba को पुनः राज्यसभा भेजना किसी व्यक्ति विशेष को सम्मान देने का मामला नहीं है। यह मणिपुर की आवाज़ को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत बनाए रखने का प्रश्न है। यह उस प्रतिनिधित्व को जारी रखने का प्रश्न है जिसने संस्कृति, सुरक्षा, विकास और जनसेवा जैसे विविध विषयों पर राज्य की चिंताओं को लगातार उठाया है।
अंततः लोकतंत्र में पद किसी व्यक्ति का अधिकार नहीं होता। लेकिन जब कोई जनप्रतिनिधि अपने कार्यकाल में प्रभावी प्रदर्शन, जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता और सार्वजनिक जीवन में गरिमा का परिचय देता है, तब उसके कार्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए। यदि यह मूल्यांकन प्रदर्शन और सेवा के आधार पर किया जाए, तो यह तर्क मजबूत दिखाई देता है कि महाराजा Leishemba Sanajaoba को पुनः राज्यसभा भेजना केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि मणिपुर के हित में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
संपादकीय टिप्पणी: यह लेख मूल रूप से India Today NE में अंग्रेज़ी भाषा में प्रकाशित हुआ था। हिंदी पाठकों के लिए इसका अनुवाद एवं पुनर्प्रकाशन प्रस्तुत किया जा रहा है। लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।

Comments