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असम सरकार के काज़ीरंगा नेशनल पार्क के आसपास ESZ सीमा 10 किमी से घटाकर 1-3 किमी करने के प्रस्ताव पर संरक्षण, विकास और स्थानीय आजीविका को लेकर बहस तेज हो गई है।

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काज़ीरंगा ESZ सीमा घटाने पर संरक्षण बनाम विकास की बहस
काज़ीरंगा ESZ सीमा घटाने पर संरक्षण बनाम विकास की बहस
असम सरकार काज़ीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिज़र्व के आसपास एक विशेष इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ), यानी पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र, बनाने की योजना बना रही है। यह ज़ोन मौजूदा सीमा से 1 से 3 किलोमीटर तक फैला होगा और अभी लागू 10 किलोमीटर की सीमा की जगह लेगा। इस योजना को लेकर मुख्यधारा मीडिया और सोशल मीडिया, दोनों जगह बहस तेज हो गई है। हालांकि यह पहल भारत के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप बताई जा रही है, लेकिन विपक्षी दलों और वन्यजीव विशेषज्ञों के विरोध के बाद इस मुद्दे ने व्यापक ध्यान खींचा है।

अब तक UNESCO की इस विश्व धरोहर स्थल के लिए ESZ की सीमा तय नहीं की गई है, इसलिए इस प्रसिद्ध जैव-विविधता हॉटस्पॉट पर 10 किलोमीटर का बफर नियम लागू है। यह बहस तब और तेज हो गई, जब दिसपुर में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने हाल ही में घोषणा की कि वह नई दिल्ली में केंद्र सरकार से काज़ीरंगा ESZ बफर की सीमा घटाकर कम से कम 1 किलोमीटर करने का अनुरोध करेगी। संरक्षित क्षेत्रों के आसपास जरूरी बफर ज़ोन आमतौर पर बड़े निर्माण, शहरी विस्तार या खनन गतिविधियों पर रोक लगाता है, क्योंकि इन गतिविधियों से इंसान और वन्यजीवों के बीच टकराव बढ़ सकता है। कुछ विशेष मौकों पर वन्यजीव सीमा पार करके बफर ज़ोन में आ सकते हैं। काज़ीरंगा फॉरेस्ट रिज़र्व के मामले में कोई बाड़ या कंक्रीट की सीमा नहीं है और मानसून की बाढ़ के दौरान जानवर अक्सर नेशनल हाईवे-715, जिसे पहले NH-37 कहा जाता था, पार करके कार्बी आंगलोंग की पहाड़ियों तक पहुंचते हैं।

विपक्षी दलों और पर्यावरण के प्रति उत्साही कई लोगों ने सरकार के इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है, जिसमें डिफॉल्ट 10 किलोमीटर की सीमा को कम करने की बात कही गई है। उनका तर्क है कि इससे कई मौकों पर वन्यजीवों की सुरक्षा का मिशन खतरे में पड़ सकता है। असम कांग्रेस प्रमुख गौरव गोगोई ने ESZ प्रस्ताव का विरोध करते हुए तर्क दिया कि बफर ज़ोन कम होने से वन्यजीव जरूरी सुरक्षा से वंचित रह जाएंगे। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के नेताओं ने भी काज़ीरंगा ESZ को कम करने के कदम का विरोध किया और इसे वापस लेने की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि कोई भी ऐसी नीति, जो बड़े कॉरपोरेट समूहों के हितों के लिए काज़ीरंगा फॉरेस्ट रिज़र्व की सुरक्षा से समझौता करती हो, बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है।

हालांकि, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने काज़ीरंगा के आसपास ESZ सीमा को फिर से तय करने के प्रस्ताव का जोरदार बचाव किया और कहा कि सरकार का यह कदम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप है। सरमा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के मुताबिक ESZ कम से कम एक किलोमीटर सीमा से होना चाहिए और परिस्थितियों के हिसाब से इसे तीन किलोमीटर तक बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया में किसी भी फॉरेस्ट रिज़र्व के आसपास 10 किलोमीटर तक फैला ESZ नहीं होता है। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि ESZ का मतलब ‘टूरिज्म इंफ्रास्ट्रक्चर न होना’ नहीं है, बल्कि यह खनन, रसायन से जुड़ी गतिविधियों और प्रदूषण फैलाने वाले दूसरे उद्योगों जैसी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए एक मुख्य गाइडलाइन है, जिनसे किसी संरक्षित इलाके की पारिस्थितिक अखंडता को नुकसान पहुंच सकता है।

इससे पहले, असम भाजपा अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने ESZ का दायरा कम करने के विरोध में कांग्रेस पार्टी की आलोचना की थी। उन्होंने दावा किया कि असम के तत्कालीन वन मंत्री रकीबुल हुसैन के कार्यकाल में 235 से अधिक कीमती गैंडों को मार दिया गया था। सैकिया ने कहा कि दिसपुर में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों ने गैंडों के अवैध शिकार की घटनाओं को काफी कम कर दिया है। असम के मंत्री पीयूष हजारिका ने भी कहा कि इस कदम से, यानी ESZ की सीमा तय करने से, काज़ीरंगा के आसपास पर्यावरण संरक्षण की पहल कमजोर नहीं होगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार 10 किलोमीटर का एक जैसा बफर ज़ोन लागू करने के बजाय वैज्ञानिक रूप से आंकी गई और जगह के हिसाब से तय 1-3 किलोमीटर की ESZ चाहती है।

दिलचस्प बात यह है कि कुछ स्थानीय निवासी भी जगह के हिसाब से बफर ज़ोन बनाने के प्रस्ताव का समर्थन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि काज़ीरंगा के आसपास के गांवों को अक्सर विकास से जुड़ी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी आजीविका के अवसर सीमित हो जाते हैं। ESZ की सीमा कम करने के समर्थन में कई प्रदर्शन करते हुए इन स्थानीय लोगों ने कहा कि विकास और संरक्षण की पहल एक-दूसरे के साथ मिलकर चलनी चाहिए, न कि आपस में टकरानी चाहिए। उनका यह भी मानना है कि नई ESZ सीमा लागू करते समय पर्यावरण पर पड़ने वाले असर का व्यापक आकलन किया जा सकता है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी नीतिगत फैसले के लिए काज़ीरंगा के आसपास रहने वाले समुदायों की राय अहम होनी चाहिए, क्योंकि वे दशकों से काज़ीरंगा के वन्यजीवों की सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण हिस्सेदार की भूमिका निभा रहे हैं।

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    Nava Thakuria

    Guest Columnist

    Nava Thakuria is a senior journalist from Assam with over three decades of experience in mainstream and freelance journalism. Born on 1 January 1968 at Bhojkuchi in western Assam, he began his career with Natun Dainik in 1990. His writings are regularly published in several national and international platforms, including The Statesman, Ishan Darpan, Pressenza International News Agency, South Asia Journal and Eurasia Review. He mainly writes on socio-political, cultural, media and environmental issues concerning North East India and neighbouring regions. An alumnus of Assam Engineering College, Thakuria was selected for global recognition by the Geneva-based Press Emblem Campaign in 2021 and now represents the organisation from South and South East Asia.

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