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गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम के एक निवासी को विदेशी घोषित करने वाले विदेशी न्यायाधिकरण के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि 15 दस्तावेज और मौखिक गवाही भी भारतीय नागरिकता कानूनी रूप से साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

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गुवाहाटी हाईकोर्ट ने विदेशी न्यायाधिकरण का फैसला बरकरार रखा, 15 दस्तावेज भी नागरिकता साबित नहीं कर सके
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने विदेशी न्यायाधिकरण का फैसला बरकरार रखा, 15 दस्तावेज भी नागरिकता साबित नहीं कर सके
 

गुवाहाटी, 2 जुलाई 2026: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में विदेशी न्यायाधिकरण (Foreigners Tribunal) द्वारा एक असम निवासी को विदेशी घोषित किए जाने के आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत 15 दस्तावेज और मौखिक गवाही भी भारतीय नागरिकता को कानूनी रूप से साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

न्यायमूर्ति कल्याण राय सुराना और शमीमा जहां की खंडपीठ ने दैनिक मजदूरी करने वाले याचिकाकर्ता की याचिका खारिज करते हुए कहा कि वह विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 के तहत अपने ऊपर मौजूद नागरिकता साबित करने के कानूनी दायित्व को पूरा करने में विफल रहा।

15 दस्तावेज पेश किए, फिर भी नहीं बना कानूनी आधार

याचिकाकर्ता, जिसका जन्म वर्ष 1988 में हुआ था और जो वर्तमान में गुवाहाटी के निकट किराये के मकान में रहता है, ने अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कई दस्तावेज अदालत के समक्ष पेश किए।

इनमें 1951 के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) की प्रतियां, जिनमें उसके पिता और दादा-दादी के नाम दर्ज थे, विभिन्न वर्षों की मतदाता सूची, वर्ष 1973 का भूमि दस्तावेज, स्कूल प्रमाणपत्र, पैन कार्ड तथा मतदाता पहचान पत्र (EPIC) शामिल थे। इसके अलावा उसके पिता ने भी परिवार की वंशावली साबित करने के लिए विदेशी न्यायाधिकरण के समक्ष गवाही दी।

हालांकि, हाईकोर्ट ने विदेशी न्यायाधिकरण के इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि प्रस्तुत दस्तावेज याचिकाकर्ता और उसके कथित पूर्वजों के बीच कानूनी रूप से स्वीकार्य संबंध स्थापित नहीं करते।

1951 NRC की प्रति को अदालत ने नहीं माना स्वीकार्य

मामले में याचिकाकर्ता को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब अदालत ने 1951 के NRC की प्रति को साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

अदालत ने कहा कि प्रस्तुत दस्तावेज केवल कंप्यूटर से निकाली गई प्रति थी, जिसमें भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63(4)) के तहत आवश्यक प्रमाणन नहीं था।

इसके अलावा अदालत ने स्पष्ट किया कि जनगणना अभिलेख, जिनमें 1951 का NRC भी शामिल है, जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा 15 के तहत न्यायालय में साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं हैं।

स्कूल प्रमाणपत्र और मतदाता सूची पर भी उठे सवाल

अदालत ने वर्ष 2017 के स्कूल प्रमाणपत्र को भी अस्वीकार कर दिया, क्योंकि न तो प्रमाणपत्र जारी करने वाले प्रधानाध्यापक को अदालत में पेश किया गया और न ही विद्यालय का प्रवेश रजिस्टर प्रस्तुत किया गया, जिससे उसकी प्रामाणिकता की पुष्टि हो सके।

इसके अलावा याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत विभिन्न मतदाता सूचियों में भी अदालत को कई विसंगतियां मिलीं।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि केवल मौखिक गवाही के आधार पर नागरिकता सिद्ध नहीं की जा सकती, जब तक कि उसे विश्वसनीय दस्तावेजी साक्ष्यों का समर्थन प्राप्त न हो।

जिरह के दौरान अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के पिता की पहचान उस व्यक्ति से मेल नहीं खाती, जिसका नाम याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत एक मतदाता सूची में दर्ज था।

हाईकोर्ट ने विदेशी न्यायाधिकरण के फैसले को सही ठहराया

सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि विदेशी न्यायाधिकरण के आदेश में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि या साक्ष्यों के मूल्यांकन में कोई कमी नहीं पाई गई।

अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि न्यायाधिकरण ने साक्ष्यों का गलत मूल्यांकन किया है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उसकी रिट याचिका खारिज कर दी और विदेशी न्यायाधिकरण द्वारा उसे विदेशी घोषित करने के आदेश को बरकरार रखा।

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