भारतीय पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माने जाने संबंधी विदेश मंत्रालय की टिप्पणी ने देश में नागरिकता सत्यापन और संभावित देशव्यापी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स यानी NRC को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
24 जून 2026 को आयोजित 14वें पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारतीय पासपोर्ट को मुख्य रूप से यात्रा दस्तावेज के रूप में देखा जाना चाहिए। मंत्रालय के अनुसार केवल पासपोर्ट के आधार पर किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता को अंतिम रूप से प्रमाणित नहीं माना जा सकता, क्योंकि वर्तमान कानूनों के अंतर्गत केंद्र सरकार विशेष परिस्थितियों में गैर नागरिकों को भी भारतीय पासपोर्ट जारी कर सकती है।
इस स्पष्टीकरण के सामने आने के बाद मुख्यधारा के मीडिया और सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई। लाखों लोगों के सामने स्वाभाविक सवाल खड़ा हुआ कि जब विस्तृत सत्यापन प्रक्रिया के बाद जारी होने वाला पासपोर्ट भी नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है, तो किसी भारतीय की नागरिकता आखिर किस दस्तावेज के आधार पर निर्धारित होगी?
इसी के साथ यह प्रश्न भी उठने लगा है कि क्या केंद्र सरकार आने वाले समय में देशव्यापी नागरिकता सत्यापन या NRC की दिशा में कोई नई पहल करने की तैयारी कर रही है।
भारत में नागरिकता नागरिकता अधिनियम, 1955 के अंतर्गत निर्धारित होती है, जबकि पासपोर्ट पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के अनुसार जारी किए जाते हैं। दोनों का कानूनी उद्देश्य अलग है।
भारतीय नागरिकता जन्म, वंश, पंजीकरण, देशीयकरण या किसी क्षेत्र के भारत में शामिल किए जाने सहित विभिन्न आधारों पर प्राप्त की जा सकती है। अधिकांश भारतीय जन्म से नागरिक होते हैं। इस कारण उन्हें अलग से नागरिकता प्रमाणपत्र लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
भारत सरकार अपने सभी नागरिकों को कोई सार्वभौमिक नागरिकता प्रमाणपत्र भी जारी नहीं करती। ऐसे में पासपोर्ट को आम तौर पर नागरिकता से जुड़ा सबसे विश्वसनीय दस्तावेज माना जाता रहा है।
हालांकि, पासपोर्ट अधिनियम के तहत विशेष परिस्थितियों में किसी गैर नागरिक को भी भारतीय पासपोर्ट जारी किया जा सकता है। इसलिए तकनीकी और कानूनी रूप से प्रत्येक भारतीय पासपोर्ट धारक का भारतीय नागरिक होना अनिवार्य नहीं है।
भारत की 1.4 अरब से अधिक आबादी में 10 प्रतिशत से भी कम लोगों के पास पासपोर्ट है। इसका अर्थ यह भी है कि पासपोर्ट को नागरिकता का अनिवार्य प्रमाण मानना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होगा।
केंद्र सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि आधार कार्ड, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और मतदाता पहचान पत्र में से किसी को भी अकेले भारतीय नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
आधार पहचान और निवास से संबंधित दस्तावेज है। पैन कार्ड मुख्य रूप से कर व्यवस्था से जुड़ा है। ड्राइविंग लाइसेंस वाहन चलाने की अनुमति देता है, जबकि मतदाता पहचान पत्र चुनावी प्रक्रिया में मतदाता की पहचान के लिए उपयोग किया जाता है।
इनमें से कोई भी दस्तावेज अपने आप में भारतीय नागरिकता का सार्वभौमिक और अंतिम प्रमाण नहीं है।
ऐसी स्थिति में यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि केंद्र सरकार भविष्य में नागरिकता के दावे को प्रमाणित करने के लिए किसी विशेष दस्तावेज या राष्ट्रीय रजिस्टर की व्यवस्था पर विचार कर सकती है। ऐसा दस्तावेज संभवतः NRC जैसी प्रक्रिया से मान्यता प्राप्त कर सकता है।
लेकिन पूरे भारत के लिए NRC को अब तक अद्यतन नहीं किया गया है। यदि देशव्यापी NRC लागू करने पर विचार होता है, तो असम में हुई प्रक्रिया उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण और चेतावनी दोनों बनेगी।
असम में NRC अद्यतन की प्रक्रिया वर्ष 2015 से 2019 के बीच चलाई गई थी। इसका उद्देश्य 1951 के नागरिक रजिस्टर को अद्यतन करके राज्य में भारतीय नागरिकों और अवैध प्रवासियों की पहचान करना था।
यह प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में संचालित हुई, लेकिन इसके बावजूद वित्तीय अनियमितताओं, त्रुटिपूर्ण सत्यापन और कथित अवैध प्रवासियों के नाम नागरिक सूची में शामिल किए जाने जैसे गंभीर आरोप सामने आए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 31 अगस्त 2019 को प्रकाशित सप्लीमेंट्री सूची को आज तक रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया ने औपचारिक रूप से प्रमाणित नहीं किया है। इसके बावजूद इसे अक्सर असम NRC की अंतिम सूची के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है।
यदि पूरे देश में NRC अद्यतन की प्रक्रिया शुरू होती है, तो सरकार के लिए असम के अनुभवों की निष्पक्ष समीक्षा करना आवश्यक होगा। जिन त्रुटियों और विवादों ने असम की प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित किया, उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर दोहराने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
असम NRC का पहला बड़ा मसौदा 30 जुलाई 2018 को प्रकाशित किया गया था। इसके बाद 31 अगस्त 2019 को सप्लीमेंट्री सूची जारी हुई, जिसमें 19 लाख से अधिक लोगों के नाम शामिल नहीं किए गए।
इस प्रक्रिया में लगभग 3.3 करोड़ लोगों ने भाग लिया था। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर 1951 के NRC को 25 मार्च 1971 की कट ऑफ तिथि के आधार पर अद्यतन किया गया था।
इसका मुख्य उद्देश्य यह निर्धारित करना था कि कौन व्यक्ति निर्धारित तिथि से पहले असम या भारत में उपस्थित था और कौन उसके बाद अवैध तरीके से देश में आया।
इतने बड़े नागरिकता सत्यापन अभियान के लिए 50 हजार से अधिक सरकारी कर्मचारियों और लगभग छह हजार अंशकालिक कर्मियों को लगाया गया। केंद्र सरकार ने इस पूरी प्रक्रिया पर लगभग 1,600 करोड़ रुपये खर्च किए।
असम मेघालय कैडर के 1995 बैच के IAS अधिकारी प्रतीक हजेला को राज्य NRC का समन्वयक नियुक्त किया गया था।
सप्लीमेंट्री सूची जारी होने के कुछ समय बाद ही असम में अपनी सुरक्षा को लेकर पैदा हुई आशंकाओं के बीच हजेला का तबादला उनके गृह राज्य मध्य प्रदेश कर दिया गया। बाद में मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने की अनुमति दे दी।
प्रतीक हजेला के बाद राज्य NRC समन्वयक बने सेवानिवृत्त IAS अधिकारी हितेश देवशर्मा ने पूरी प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप लगाए।
उनका आरोप था कि बड़ी संख्या में अवैध प्रवासियों, विशेष रूप से बांग्लादेश से आए मुस्लिम बसने वालों को सूची में शामिल करने के उद्देश्य से सॉफ्टवेयर प्रणाली में छेड़छाड़ की गई।
देवशर्मा ने यह भी दावा किया कि फैमिली ट्री मैचिंग जैसी महत्वपूर्ण सत्यापन प्रक्रिया से समझौता किया गया। इस प्रक्रिया का उद्देश्य एक ही पूर्वज या परिवार से नागरिकता का दावा करने वाले आवेदकों के दस्तावेज और पारिवारिक संबंधों की जांच करना था।
इन आरोपों के आधार पर उन्होंने प्रतीक हजेला और उनके सहयोगियों की भूमिका की जांच नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी और डायरेक्टरेट ऑफ एनफोर्समेंट से कराने की मांग की।
देवशर्मा की शिकायतों पर असम पुलिस ने अब तक कोई मामला दर्ज नहीं किया है। लेकिन वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित उनके आरोपों को नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट से भी बल मिला।
31 मार्च 2020 को समाप्त वित्त वर्ष से संबंधित अपनी रिपोर्ट में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने असम NRC अद्यतन प्रक्रिया के दौरान लगभग 260 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितताओं की ओर संकेत किया।
CAG ने तत्कालीन राज्य NRC समन्वयक प्रतीक हजेला और सिस्टम इंटीग्रेटर के रूप में कार्यरत विप्रो लिमिटेड के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश भी की थी।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि वर्ष 2019 में तैयार NRC त्रुटिपूर्ण था। उनका कहना है कि दोषपूर्ण नागरिक रजिस्टर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है और इससे असम के मूल निवासियों के हित प्रभावित हो सकते हैं।
इससे स्पष्ट होता है कि असम NRC पर सवाल केवल किसी एक अधिकारी या संगठन ने नहीं उठाए। राज्य सरकार, पूर्व NRC समन्वयक और संवैधानिक लेखा संस्था के स्तर पर भी गंभीर आपत्तियां सामने आई हैं।
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने असम NRC के व्यापक पुनर्सत्यापन की मांग से जुड़ी एक रिट याचिका पर सुनवाई स्वीकार की है।
यह याचिका हितेश देवशर्मा ने अपनी व्यक्तिगत क्षमता और असम के बड़ी संख्या में मूल निवासियों के प्रतिनिधि के रूप में दाखिल की है। इसमें समयबद्ध सत्यापन के माध्यम से त्रुटिरहित और विश्वसनीय NRC तैयार करने की मांग की गई है।
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार, असम सरकार, राज्य NRC समन्वयक और रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
यह घटनाक्रम उन आरोपों की गंभीरता को दर्शाता है जो उस प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों और संस्थाओं पर लगाए गए हैं, जिसका संचालन और निरीक्षण सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में हुआ था।
यदि भविष्य में देशव्यापी NRC लागू करने की दिशा में कोई कदम उठाया जाता है, तो असम के अनुभवों की निष्पक्ष और विस्तृत समीक्षा किए बिना आगे बढ़ना उचित नहीं होगा।
असम NRC प्रक्रिया के दौरान डेटा एंट्री ऑपरेटर के रूप में नियुक्त अस्थायी कर्मचारियों के भुगतान को लेकर भी गंभीर प्रश्न उठे।
इन कर्मचारियों को प्रति व्यक्ति लगभग 5,500 रुपये से 9,100 रुपये प्रतिमाह देने की पेशकश की गई थी। आरोप है कि यह राशि उस समय लागू न्यूनतम मजदूरी के कानूनी मानकों से भी कम थी।
दूसरी ओर, सिस्टम इंटीग्रेटर के रूप में कार्यरत विप्रो को प्रत्येक डेटा एंट्री ऑपरेटर के लिए लगभग 14,500 रुपये प्रतिमाह का भुगतान किया गया।
सिस्टम इंटीग्रेटर के वैध कमीशन को घटाने के बाद भी भुगतान में कथित हेराफेरी की कुल राशि एक अरब रुपये से अधिक होने का अनुमान लगाया गया। आरोप लगाया गया कि यह धन विप्रो या उसके सब कॉन्ट्रैक्टर इंटीग्रेटेड सिस्टम एंड सर्विसेज के पास गया।
इन आरोपों की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच आवश्यक है, क्योंकि नागरिकता जैसे संवेदनशील विषय से जुड़ी प्रक्रिया में वित्तीय जवाबदेही और प्रशासनिक पारदर्शिता दोनों महत्वपूर्ण हैं।
असम NRC से जुड़े विवादों के दौरान स्थानीय मीडिया के एक हिस्से की भूमिका भी आलोचना के घेरे में रही।
आरोप लगाया गया कि कुछ अपवादों को छोड़कर असम के अधिकांश मीडिया संस्थानों ने वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित मामलों को अपेक्षित गंभीरता से नहीं उठाया।
कई मीडियाकर्मी लगातार यह दावा करते रहे कि 31 अगस्त 2019 को प्रकाशित सप्लीमेंट्री सूची ही अंतिम NRC है और उसके बाद किसी प्रकार के सत्यापन या पुनर्सत्यापन की कोई संभावना नहीं है।
गुवाहाटी के एक टेलीविजन प्रस्तोता ने बिना किसी व्यापक पुनर्सत्यापन के उसी सूची को अंतिम रूप से स्वीकार करने की सार्वजनिक वकालत भी की थी।
बाद में सोशल मीडिया पर आरोप लगाया गया कि वह भी NRC अद्यतन प्रक्रिया के कथित लाभार्थियों में शामिल थे। हालांकि, अपने आक्रामक सार्वजनिक तेवरों के लिए पहचाने जाने वाले इस प्रस्तोता ने आरोपों पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी।
उन्होंने प्रतीक हजेला के काम की प्रशंसा करते हुए एक पुस्तक भी लिखी थी, जिसमें हजेला के कार्य को असाधारण उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया।
इन घटनाओं ने नागरिकता सत्यापन जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में मीडिया की निष्पक्षता, जिम्मेदारी और संभावित हितों के टकराव को लेकर भी सवाल खड़े किए।
असम में NRC अद्यतन केवल एक प्रशासनिक अभ्यास नहीं था। इसने नागरिकता, पहचान, मूल निवास, अवैध प्रवासन, राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े अनेक जटिल सवाल पैदा किए।
वित्तीय अनियमितताओं के आरोप, सॉफ्टवेयर और फैमिली ट्री सत्यापन पर उठे प्रश्न, CAG की टिप्पणियां, राज्य सरकार की आपत्तियां और सर्वोच्च न्यायालय में लंबित पुनर्सत्यापन की मांग बताती है कि इस प्रक्रिया की व्यापक समीक्षा अभी शेष है।
यदि नई दिल्ली वास्तव में देशव्यापी NRC लागू करने की संभावना पर विचार कर रही है, तो उसे सबसे पहले असम के अनुभवों से सीखना होगा।
किसी भी राष्ट्रीय नागरिकता सत्यापन प्रक्रिया की विश्वसनीयता केवल उसके घोषित उद्देश्य से तय नहीं होगी। वह प्रक्रिया कितनी पारदर्शी, निष्पक्ष, जवाबदेह और त्रुटिरहित है, यह अधिक महत्वपूर्ण होगा।
असम का अनुभव बताता है कि न्यायिक निगरानी के अंतर्गत संचालित किसी प्रक्रिया में भी विवाद, प्रशासनिक त्रुटियां और गंभीर आरोप सामने आ सकते हैं।
इसलिए भविष्य की किसी भी नागरिकता सत्यापन व्यवस्था में मजबूत सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होगी। ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी जिसमें वास्तविक भारतीय नागरिकों को केवल दस्तावेजों की कमी या प्रशासनिक गलती के कारण अपनी नागरिकता साबित करने के संकट से न गुजरना पड़े।
साथ ही, नागरिकता सत्यापन के राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े उद्देश्य भी कमजोर नहीं होने चाहिए।
देशव्यापी NRC जैसे विशाल अभियान के लिए स्पष्ट कानूनी आधार, स्वीकार्य दस्तावेजों की पारदर्शी सूची, अपील की स्वतंत्र व्यवस्था, प्रशिक्षित कर्मचारी, सुरक्षित तकनीकी प्रणाली और वित्तीय जवाबदेही आवश्यक होगी।
एक निष्पक्ष और समयबद्ध जांच ही स्पष्ट कर सकती है कि असम NRC अद्यतन के दौरान वास्तव में क्या हुआ, कथित अनियमितताओं के लिए कौन जिम्मेदार था और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों को कैसे रोका जा सकता है।
यह भी तय किया जाना चाहिए कि क्या वर्ष 2019 की सप्लीमेंट्री सूची को व्यापक पुनर्सत्यापन के बिना अंतिम नागरिक रजिस्टर के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
यदि इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर नहीं मिलते, तो पूरे देश में NRC लागू करने की किसी भी संभावित पहल पर वही सवाल दोबारा खड़े होंगे जिनका सामना असम पिछले कई वर्षों से कर रहा है।
पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माने जाने की ताजा बहस ने भारत में एक सार्वभौमिक और विश्वसनीय नागरिकता प्रमाण प्रणाली की आवश्यकता को फिर सामने ला दिया है।
लेकिन देशव्यापी NRC की दिशा में बढ़ने से पहले असम में हुई गलतियों, विवादों और कथित अनियमितताओं का समाधान करना जरूरी है। अन्यथा नागरिकता सत्यापन की एक नई राष्ट्रीय प्रक्रिया भी विश्वास पैदा करने के बजाय आशंका, मुकदमेबाजी और सामाजिक असुरक्षा को जन्म दे सकती है।