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मणिपुर पर मोहन भागवत का स्पष्ट संदेश: “परिवार साथ रहेगा”, विभाजन नहीं समाधान चाहिए

मणिपुर दौरे में RSS सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि राज्य की समस्याओं का समाधान संवैधानिक ढांचे और “एक परिवार” की भावना के भीतर ही होगा। जानिए उनके संदेश का राजनीतिक और सामाजिक महत्व।

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आरएसएस सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की नवंबर 2025 की मणिपुर यात्रा केवल एक औपचारिक दौरा नहीं थी, बल्कि राज्य में चल रहे जातीय संघर्ष पर एक स्पष्ट वैचारिक और राजनीतिक संदेश भी थी। उन्होंने मणिपुर संकट को “परिवार के भीतर का विषय” बताते हुए बाहरी हस्तक्षेप और विभाजनकारी राजनीति को खारिज किया।

मई 2023 से शुरू हुई हिंसा ने न केवल हजारों लोगों को विस्थापित किया, बल्कि घाटी और पहाड़, मैतेई और कुकी, नागरिक समाज और प्रशासन—सभी के बीच गहरा अविश्वास पैदा कर दिया। इस पूरे संकट के बीच नवंबर 2025 में आरएसएस सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की तीन दिवसीय मणिपुर यात्रा केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं थी; यह एक स्पष्ट वैचारिक और राजनीतिक हस्तक्षेप था।

भागवत ने अपने पूरे दौरे में एक ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जो आक्रामक नहीं थी, लेकिन बेहद स्पष्ट थी। उन्होंने न तो किसी समुदाय को सीधा दोषी ठहराया और न ही राजनीतिक नारेबाज़ी का सहारा लिया। इसके बजाय उन्होंने उस मूल प्रश्न को छुआ, जिसे लेकर पूरे देश में बहस चल रही है—क्या मणिपुर की समस्या का समाधान विभाजन में है या पुनर्समागम में?

21 नवंबर को जनजातीय नेताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “परिवार के भीतर की समस्याओं का समाधान परिवार के भीतर ही होना चाहिए। संवाद एकात्मता के आधार पर होना चाहिए, न कि किसी सौदेबाज़ी के आधार पर।” देखने में यह एक सामान्य वाक्य लग सकता है, लेकिन वास्तव में यही इस यात्रा का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश था।

इस एक वाक्य के जरिए आरएसएस ने उस पूरे नैरेटिव को चुनौती दी, जो पिछले ढाई वर्षों में “मैतेई बनाम कुकी” संघर्ष के रूप में स्थापित किया गया था। भागवत ने साफ संकेत दिया कि यह संघर्ष दो अलग राष्ट्रों के बीच का संघर्ष नहीं, बल्कि एक ही राष्ट्रीय परिवार के भीतर पैदा हुआ संकट है, जिसका समाधान भी उसी ढांचे के भीतर खोजा जाएगा।

यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई ऐसे स्वर उभरे जिन्होंने मणिपुर के लिए अलग प्रशासन, स्वायत्त क्षेत्रीय परिषदों या विशेष राजनीतिक ढांचे की मांग की। कुछ विदेशी संस्थाओं, चर्च समूहों और अंतरराष्ट्रीय टिप्पणीकारों ने इस संघर्ष को लगभग एक “स्थायी जातीय युद्ध” की तरह प्रस्तुत करने की कोशिश की। भागवत का संदेश इन सभी धारणाओं के खिलाफ एक वैचारिक जवाब था।

उन्होंने यह भी कहा कि मणिपुर का समाधान केवल संवैधानिक ढांचे के भीतर ही संभव है। इसका सीधा अर्थ था—न अलग प्रशासन, न बाहरी मध्यस्थता और न ही औपनिवेशिक सोच के आधार पर राज्य का विभाजन। यह संदेश घाटी और पहाड़ी दोनों क्षेत्रों के लिए था।

भागवत की रणनीति का सबसे दिलचस्प पहलू उसका क्रम था। उन्होंने पहले जनजातीय नेताओं की बातें सुनीं, उनकी पीड़ा को स्वीकार किया और कहा कि उनकी समस्याएँ राष्ट्रीय समस्याएँ हैं। उसके बाद उन्होंने “परिवार” की सीमा रेखा खींची। यही संघ की पारंपरिक शैली मानी जाती है—पहले संवाद, फिर वैचारिक फ्रेम तय करना।

मैतेई समाज के लिए भी यह यात्रा भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण रही। लंबे समय से घाटी में यह डर बना हुआ था कि कहीं केंद्र सरकार या राष्ट्रीय संस्थाएँ “शांति” के नाम पर राज्य के विभाजन की दिशा में न बढ़ जाएँ। भागवत ने अपने बयानों से यह स्पष्ट संकेत दिया कि आरएसएस किसी भी कीमत पर मणिपुर के विखंडन का समर्थन नहीं करेगा।

यह पहली बार था जब किसी बड़े राष्ट्रीय वैचारिक संगठन ने इतने स्पष्ट शब्दों में “एक परिवार” की अवधारणा के जरिए मणिपुर संकट को देखने की कोशिश की। इससे पहले अधिकतर चर्चाएँ या तो सुरक्षा बलों की भूमिका तक सीमित थीं या फिर जातीय पहचान की राजनीति में उलझ जाती थीं।

भागवत ने अपने भाषण में औपनिवेशिक नीतियों को भी वर्तमान संकट की जड़ बताया। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने जानबूझकर घाटी और पहाड़ी क्षेत्रों के बीच प्रशासनिक और सामाजिक दूरी पैदा की। अलग-अलग पहचान को राजनीतिक रूप देकर उन्होंने स्थायी अविश्वास की राजनीति को जन्म दिया। स्वतंत्रता के बाद वोट-बैंक राजनीति और अलगाववादी ताकतों ने इस विभाजन को और गहरा किया।

यह विश्लेषण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संघर्ष को “अनंत जातीय घृणा” के रूप में नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं के परिणाम के रूप में देखने की कोशिश करता है। इससे समाधान की संभावना भी बनती है, क्योंकि यदि समस्या मानवीय और राजनीतिक प्रक्रियाओं से बनी है, तो उसका समाधान भी संभव है।

यात्रा के अंतिम दिन युवाओं से संवाद करते हुए भागवत ने कहा कि मणिपुर का भविष्य सड़क अवरोधों, प्रतिरोध और टकराव की राजनीति में नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, शिक्षा, कौशल विकास और समाज पुनर्निर्माण में है। यह संदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि पिछले दो वर्षों में सबसे अधिक प्रभावित वर्ग युवाओं का ही रहा है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि “हिंदू” केवल धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत दृष्टि है—ऐसी दृष्टि जो विविधता के भीतर एकता को स्वीकार करती है। उनके अनुसार भारत की शक्ति उसकी समानता में नहीं, बल्कि उसकी विविधताओं के बावजूद जीवित एकात्म चेतना में है।

राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो भागवत की यह यात्रा पूर्वोत्तर भारत में आरएसएस की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा भी प्रतीत होती है। संघ लंबे समय से पूर्वोत्तर में अपनी वैचारिक और सामाजिक उपस्थिति को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। मणिपुर इस रणनीति का केंद्रीय बिंदु बन सकता है क्योंकि यह सांस्कृतिक, सामरिक और राजनीतिक तीनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य है।

लेकिन इस यात्रा का सबसे बड़ा प्रभाव शायद मनोवैज्ञानिक स्तर पर पड़ा। हिंसा, विस्थापन और अविश्वास के बीच जी रहे समाज को पहली बार किसी बड़े राष्ट्रीय मंच से यह संदेश मिला कि समाधान विभाजन नहीं, बल्कि पुनर्समागम है।

मोहन भागवत ने अपने पूरे दौरे में कहीं भी उत्तेजक भाषा का प्रयोग नहीं किया। उन्होंने न तो प्रतिशोध की बात की और न ही किसी समुदाय को “राष्ट्र-विरोधी” कहकर खारिज किया। इसके बजाय उन्होंने धैर्य, अनुशासन और दीर्घकालिक सामाजिक पुनर्निर्माण की बात की। यही कारण है कि उनका संदेश केवल राजनीतिक बयान बनकर नहीं रह गया, बल्कि एक व्यापक वैचारिक हस्तक्षेप में बदल गया।

आज मणिपुर एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक रास्ता स्थायी विभाजन, अविश्वास और बाहरी हस्तक्षेप की ओर जाता है। दूसरा रास्ता कठिन जरूर है, लेकिन वह सामाजिक पुनर्निर्माण, संवैधानिक एकता और साझा भविष्य की ओर जाता है। मोहन भागवत की यात्रा ने स्पष्ट कर दिया कि आरएसएस दूसरे रास्ते के साथ खड़ा है।

यह केवल एक राजनीतिक संदेश नहीं था; यह भारत की सभ्यतागत अवधारणा की पुनर्पुष्टि थी—कि मतभेद हो सकते हैं, संघर्ष हो सकते हैं, लेकिन अंततः परिवार टूटता नहीं, समाधान खोजता है।

और शायद यही इस पूरी यात्रा का सबसे बड़ा संदेश था—मणिपुर को बाँटकर नहीं, जोड़कर ही बचाया जा सकता है।

(यह लेख पहली बार 22 नवंबर 2025 को इंडिया टुडे एनई में प्रकाशित हुआ था। जनहित में पुनर्प्रकाशित।)

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Naorem Mohen

Editor, Purvottar Khabar

Naorem Mohen is the Editor of Purvottar Khabar. He covers breaking news, politics, social issues, and regional developments from Manipur and Northeast India. With a focus on ground-level journalism and accurate reporting, he aims to deliver reliable news and insightful coverage to Hindi readers across the country.

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