मणिपुर संघर्ष को पश्चिमी मीडिया, कुछ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंचों, चर्च से जुड़े वकालत समूहों और यूरोपीय संसद के कुछ विमर्शों में बार-बार धार्मिक संकट के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जुलाई 2023 में यूरोपीय संसद ने भारत से मणिपुर में “जातीय और धार्मिक हिंसा” रोकने तथा ईसाई समुदाय सहित धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा करने की अपील की थी।
दूर बैठे पर्यवेक्षकों के लिए यह व्याख्या आकर्षक लग सकती है। इसमें एक परिचित वैश्विक कथा आसानी से बैठ जाती है: हिंदू बहुसंख्यक, ईसाई अल्पसंख्यक, भाजपा सरकार और धार्मिक उत्पीड़न। लेकिन मणिपुर इतना सरल नहीं है। उसे केवल बाहर से उधार ली गई श्रेणियों में समझना न तो उचित है और न ही ईमानदार विश्लेषण।
पिछले चार महीनों में मणिपुर में नगा और कुकी समूहों के बीच बढ़ते तनाव और हिंसा ने एक बार फिर राज्य की जटिल जातीय वास्तविकता को सामने ला दिया है। 40 से अधिक नागरिकों की मृत्यु, कई घरों के जलने और गांवों में भय के माहौल के बावजूद न तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इसे धार्मिक युद्ध कहा और न ही प्रमुख मानवाधिकार संगठनों ने इसे ईसाई समुदायों के बीच धार्मिक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया। यह चुप्पी अपने आप में महत्वपूर्ण है। जब संघर्ष नगा और कुकी समुदायों के बीच होता है, तब उसे भूमि, जातीय दावे, स्थानीय प्रभुत्व और सशस्त्र समूहों के संदर्भ में समझा जाता है। लेकिन जैसे ही संघर्ष मैतेई और कुकी समुदायों के बीच आता है, वही विमर्श अचानक हिंदू द्वारा ईसाई पर अत्याचार की कथा में बदल दिया जाता है। यही चयनात्मक दृष्टि मणिपुर को समझने की सबसे बड़ी बाधा है।
मणिपुर का संकट धर्मशास्त्र से पैदा नहीं हुआ। यह मंदिर, चर्च, पूजा पद्धति, मतांतरण या धार्मिक सिद्धांतों का संघर्ष नहीं है। इसकी जड़ें कहीं अधिक गहरी और जटिल हैं। भूमि पर दावा, जातीय पहचान, अवैध प्रवासन को लेकर चिंता, वन प्रशासन, सशस्त्र समूहों की भूमिका, क्षेत्रीय दावे, जनसांख्यिकीय असुरक्षा, अनुसूचित जनजाति दर्जे की मांग, अलग प्रशासन की मांग और संस्थाओं की विफलता, इन सबने मिलकर वर्तमान संकट को जन्म दिया है।
ऐसे संकट को केवल धार्मिक संघर्ष कहना विश्लेषण नहीं, सुविधा है।
3 मई 2023 को मैतेई और कुकी समुदायों के बीच हिंसा भड़कने से पहले भी मणिपुर ने कुकी समूहों और अन्य समुदायों से जुड़े कई बड़े संघर्ष देखे थे। उन संघर्षों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक युद्ध नहीं कहा गया। उनमें शामिल कई समुदाय ईसाई थे। कुछ एक दूसरे से जातीय और सांस्कृतिक रूप से भी निकट थे। फिर भी उन संघर्षों की व्याख्या जातीय पहचान, क्षेत्रीय नियंत्रण, सशस्त्र लामबंदी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के आधार पर की गई।
1990 के दशक का कुकी-नगा संघर्ष मणिपुर के स्वतंत्रता पश्चात इतिहास के सबसे पीड़ादायक अध्यायों में से एक है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में बताया था कि 1993 से 1998 के बीच नगा-कुकी संघर्ष में 750 लोगों की मृत्यु हुई और छिटपुट घटनाएं लगभग एक दशक तक जारी रहीं। यह हिंदू-ईसाई संघर्ष नहीं था। दोनों पक्षों में मजबूत ईसाई उपस्थिति वाले समुदाय थे। मुद्दा धर्म नहीं था। मुद्दा था क्षेत्र, पहचान, गांवों पर नियंत्रण, राजनीतिक दावे और सशस्त्र संघर्ष।
1997-98 का कुकी-पाइते संघर्ष धार्मिक युद्ध की धारणा को और कमजोर करता है। उसी आधिकारिक बयान में कहा गया था कि इस संघर्ष में 50 से अधिक गांव नष्ट हुए, लगभग 13,000 लोग विस्थापित हुए, 352 लोगों की मृत्यु हुई, सैकड़ों लोग घायल हुए और करीब 5,000 घर जलाए गए। यदि दो बड़े पैमाने पर ईसाई समुदायों के बीच इतने विनाशकारी संघर्ष में धर्म केंद्रीय कारण नहीं था, तो केवल मैतेई समुदाय के शामिल होने पर धर्म अचानक मुख्य कारण कैसे बन जाता है?
मोरेह का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। जून 1995 में इस सीमावर्ती कस्बे में सामुदायिक हिंसा में 13 लोग मारे गए, जिनमें सात तमिल नागरिक, चार कुकी और दो मैतेई शामिल थे। 25 लोग घायल हुए। यह घटना सीमावर्ती नगर की असुरक्षा, स्थानीय शक्ति संतुलन, आर्थिक हितों और जातीय संबंधों से जुड़ी थी। इसे अंतरराष्ट्रीय धार्मिक कथा में नहीं बदला गया।
यह पैटर्न केवल मणिपुर तक सीमित नहीं है। असम के करबी आंगलोंग जिले में 2003-04 के करबी-कुकी संघर्ष में सशस्त्र संगठनों और जातीय लामबंदी की भूमिका दर्ज की गई। मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के अध्ययन के अनुसार इस हिंसा में कम से कम 23 कुकी और 54 करबी मारे गए। यहां भी धर्म मुख्य व्याख्या नहीं था। संघर्ष भूमि, संसाधन, पहचान और राजनीतिक नियंत्रण से जुड़ा था।
व्यापक कुकी-जो परिवार के भीतर भी पहचान, प्रतिनिधित्व और स्थानीय अधिकार को लेकर तनाव सामने आए हैं। मार्च 2025 में चुराचांदपुर जिले में हमार और जोमी समूहों के बीच झड़प में 53 वर्षीय एक व्यक्ति की मृत्यु हुई और कई लोग घायल हुए। राष्ट्रीय मीडिया में पुलिस रिपोर्टों के हवाले से यह तथ्य सामने आया। इसे भी धार्मिक हिंसा नहीं कहा गया। इसे वही माना गया जो वह था: स्थानीय दावों, जातीय पहचान और आंतरिक सामुदायिक तनाव से जुड़ा संघर्ष।
इतिहास एक मूल प्रश्न उठाता है। यदि कुकी और नगा, कुकी और पाइते, कुकी और तमिल, कुकी और करबी तथा कुकी-जो परिवार के भीतर के तनाव धार्मिक युद्ध नहीं थे, तो मैतेई-कुकी संघर्ष को ही धार्मिक युद्ध के ढांचे में क्यों धकेला जा रहा है?
इसका एक उत्तर राजनीति में है।
जब 2023 की हिंसा भड़की, मणिपुर में भाजपा सरकार थी। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति से जोड़ा जाता है। इसलिए बाहरी टिप्पणीकारों ने मणिपुर को तुरंत एक परिचित राष्ट्रीय कथा में फिट कर दिया। मैतेई को मुख्य रूप से हिंदू के रूप में प्रस्तुत किया गया। कुकी को मुख्य रूप से ईसाई के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसके बाद संघर्ष को बहुसंख्यक आक्रामकता और अल्पसंख्यक उत्पीड़न की भाषा में पढ़ा गया।
यह यूरोप या वाशिंगटन की राजनीतिक बहस में सुविधाजनक हो सकता है। लेकिन यह मणिपुर को नहीं समझाता।
मैतेई समाज धार्मिक रूप से एकरूप नहीं है। इसमें सनामही आस्था के अनुयायी हैं, हिंदू हैं, ईसाई हैं और अन्य धार्मिक पहचान वाले लोग भी हैं। संकट के दौरान मैतेई ईसाइयों ने भी कष्ट झेले। बहुत से मैतेई अपनी सार्वजनिक पहचान को भाजपा के माध्यम से परिभाषित नहीं करते। किसी समुदाय को उस पार्टी में सीमित नहीं किया जा सकता जो राज्य की सत्ता में है। मैतेई भाजपा नहीं हैं। कुकी केवल ईसाई नहीं हैं। नगा मणिपुर के इतिहास में कोई गौण उपस्थिति नहीं हैं। राज्य को दो धार्मिक कॉलम में बांटकर नहीं पढ़ा जा सकता।
धार्मिक व्याख्या ने एक गंभीर नैतिक असंतुलन भी पैदा किया है। जब पीड़ित कुकी ईसाई होते हैं, अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति तुरंत और स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। जब नगा, जिनमें अनेक ईसाई हैं, कुकी सशस्त्र तत्वों या भीड़ की हिंसा का शिकार होते हैं, वही वैश्विक शब्दावली धीमी पड़ जाती है।
छह लियांगमई नगा नागरिकों की हालिया हत्या इस असंगति को सामने लाती है। ‘Justice for the Six Liangmai Nagas’ नामक वकालत रिपोर्ट के अनुसार छह लियांगमई नगा नागरिक, जिनमें दो पादरी और एक चर्च डीकन शामिल थे, 13 मई से 10 जून 2026 के बीच अपहृत किए गए, लगभग 27 दिनों तक कैद में रखे गए और बाद में मृत पाए गए। रिपोर्ट में कहा गया कि पीड़ित नागरिक थे और किसी सशस्त्र संगठन के सदस्य नहीं थे।
उसी रिपोर्ट के अनुसार इस घटना ने नागरिक सुरक्षा, संस्थागत जवाबदेही और कानून के शासन को लेकर गंभीर चिंता पैदा की। यह त्रासदी अनसुलझे भूमि विवादों, बसावट विस्तार और Suspension of Operations ढांचे से जुड़ी आशंकाओं के व्यापक संदर्भ में सामने आई।
यदि नगा पादरियों और चर्च से जुड़े नागरिकों की हत्या समान अंतरराष्ट्रीय धार्मिक आक्रोश पैदा नहीं करती, तो मणिपुर की धार्मिक व्याख्या चयनात्मक हो जाती है। बात यह नहीं है कि ईसाई पीड़ा को अनदेखा किया जाए। उसे कभी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। बात यह है कि सभी पीड़ा देखी जानी चाहिए। सभी पीड़ितों का महत्व होना चाहिए। मानवाधिकार की वह भाषा जो एक समूह के लिए तेज और दूसरे के लिए धीमी हो जाती है, अपनी नैतिक शक्ति खो देती है।
यहीं मैतेई समुदाय पर अन्यायपूर्ण बोझ डाला गया है। भाजपा के सत्ता में होने के कारण मैतेई को राष्ट्रीय राजनीति की छवि से पढ़ा जाने लगा। यह राजनीतिक रूप से सुविधाजनक है, पर सामाजिक रूप से अन्यायपूर्ण। यदि मणिपुर में किसी अन्य दल की सरकार होती, चाहे कांग्रेस, वामपंथी दल या कोई क्षेत्रीय दल, तो धार्मिक व्याख्या शायद इतनी अंतरराष्ट्रीय ताकत नहीं पकड़ती। इस अर्थ में मैतेई समुदाय ने उस राष्ट्रीय राजनीतिक फ्रेम की कीमत चुकाई, जिसे उसने सामूहिक रूप से निर्मित नहीं किया था।
इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी अपराध को छिपाया जाए। मैतेई व्यक्तियों, समूहों या भीड़ द्वारा किए गए अपराधों की जांच और सजा होनी चाहिए। कुकी व्यक्तियों, समूहों या भीड़ द्वारा किए गए अपराधों की भी जांच और सजा होनी चाहिए। चर्चों के विनाश की निंदा होनी चाहिए। मंदिरों, घरों, गांवों, स्कूलों और सार्वजनिक संस्थानों के विनाश की भी निंदा होनी चाहिए। कुकी नागरिक की मृत्यु महत्वपूर्ण है। मैतेई नागरिक की मृत्यु महत्वपूर्ण है। नगा पादरी की मृत्यु भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
मानव गरिमा चयनात्मक नहीं हो सकती।
संघर्ष की वास्तविक जड़ें कहीं और हैं। वे भूमि और बसावट के दावों में हैं। वे मूलनिवासी पहचान की प्रतिस्पर्धी अवधारणाओं में हैं। वे जनसांख्यिकीय परिवर्तन के भय में हैं। वे अवैध प्रवासन और सीमा प्रबंधन की चिंताओं में हैं। वे सशस्त्र समूहों की भूमिका में हैं, जिनमें वे संगठन भी शामिल हैं जो युद्धविराम व्यवस्था के अधीन हैं। वे पहाड़ और घाटी के संबंधों की ऐतिहासिक असंतुलन में हैं। वे राज्य की उस विफलता में हैं जो प्रतिस्पर्धी दावों को अधिकार, निष्पक्षता और विश्वसनीयता के साथ संभाल नहीं सकी।
Reuters की एक रिपोर्ट ने मणिपुर संकट को दो बड़े जातीय समूहों के बीच भूमि, रोजगार और राजनीतिक प्रभाव की प्रतिस्पर्धा के रूप में देखा, जहां हथियारों का प्रसार हुआ और हजारों लोग विस्थापित हुए। यह सारांश मणिपुर की वास्तविकता के अधिक निकट है बनिस्बत उस सरल छवि के, जिसमें इसे धार्मिक युद्ध बना दिया जाता है। धर्म पहचान और बाहरी सहानुभूति को प्रभावित कर सकता है, लेकिन वह मूल कारण नहीं है।
गलत निदान गलत समाधान पैदा करता है। यदि संघर्ष को हिंदू-ईसाई युद्ध माना जाएगा, तो नीति प्रतिक्रिया केवल धार्मिक सुरक्षा पर केंद्रित होगी। इससे भूमि विवाद हल नहीं होंगे। सशस्त्र समूहों की जवाबदेही तय नहीं होगी। बसावट विस्तार के प्रश्न नहीं सुलझेंगे। पहाड़ और घाटी के बीच विश्वास बहाल नहीं होगा। नगा समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी, जो प्रतिस्पर्धी सशस्त्र और क्षेत्रीय दबावों के बीच फंसे हुए हैं। यह भी समझ में नहीं आएगा कि कुकी समूहों के संघर्ष नगा, पाइते, हमार, तमिल, करबी और अन्य समूहों से क्यों हुए।
खतरा केवल बौद्धिक नहीं है। जब मणिपुर को धार्मिक उत्पीड़न के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया जाता है, तो हर घटना उसी चश्मे से देखी जाती है। हर पीड़ित एक पक्ष का प्रमाण बन जाता है। हर आरोपी पूरे समुदाय का प्रतिनिधि मान लिया जाता है। हर अपराध स्थानीय कारणों से अलग होकर वैश्विक नैतिक अभियान में जोड़ दिया जाता है। इससे मेल-मिलाप कठिन होता है, क्योंकि एकपक्षीय कथाओं को लाभ मिलता है।
मणिपुर को सत्य चाहिए, बाहर से थोपी गई सरलता नहीं।
यूरोपीय संसद और पश्चिमी मीडिया को मानवाधिकारों को लेकर चिंता व्यक्त करने का पूरा अधिकार है। लेकिन चिंता के साथ ऐतिहासिक अनुशासन भी होना चाहिए। यदि वे धार्मिक अल्पसंख्यकों की बात करते हैं, तो उन्हें जातीय जटिलता की भी बात करनी चाहिए। यदि वे ईसाइयों की बात करते हैं, तो उन्हें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि ईसाई समुदाय स्वयं अलग-अलग संघर्षों में अलग-अलग पक्षों पर रहे हैं। यदि वे मैतेई को हिंदू के रूप में प्रस्तुत करते हैं, तो उन्हें सनामही मैतेई, मैतेई ईसाई और मैतेई समाज की आंतरिक विविधता को भी स्वीकार करना चाहिए। यदि वे हिंसा की निंदा करते हैं, तो उन्हें सभी हिंसा की निंदा करनी चाहिए, पीड़ितों का चुनाव उनकी कथा उपयोगिता के आधार पर नहीं करना चाहिए।
चर्च निकायों पर भी जिम्मेदारी है। उनकी नैतिक शक्ति तब सबसे अधिक होती है जब वे जातीय सुविधा से ऊपर उठकर बोलते हैं। पादरी की हत्या महत्वपूर्ण होनी चाहिए, चाहे वह कुकी हो, नगा हो, मैतेई हो या किसी अन्य समुदाय से हो। चर्च का जलना महत्वपूर्ण होना चाहिए। नागरिक की हत्या महत्वपूर्ण होनी चाहिए। परिवार का विस्थापन महत्वपूर्ण होना चाहिए। चयनात्मक करुणा आस्था आधारित वकालत की नैतिक नींव को कमजोर करती है।
मीडिया को भी अपनी आदतों की समीक्षा करनी चाहिए। मणिपुर को केवल सुर्खियों से नहीं समझा जा सकता। इसके लिए ऐतिहासिक स्मृति चाहिए। कुकी-नगा संघर्ष, कुकी-पाइते संघर्ष, मोरेह हिंसा, करबी-कुकी झड़पों और हालिया आंतरिक जनजातीय तनावों की जानकारी चाहिए। इस पृष्ठभूमि के बिना रिपोर्टिंग अक्सर सबसे तेज आवाज, सबसे सुलभ प्रवक्ता या सबसे परिचित वैचारिक ढांचे पर निर्भर हो जाती है।
मैतेई-कुकी संघर्ष हिंदू-ईसाई युद्ध नहीं है। यह भूमि, पहचान, सशस्त्र शक्ति, प्रशासनिक विफलता, सीमा राजनीति और ऐतिहासिक अविश्वास से निर्मित संघर्ष है। इसे केवल धार्मिक कहना राज्य को गलत पढ़ना और दुनिया को गलत दिशा देना है।
मणिपुर तब तक नहीं संभलेगा जब तक उसके संघर्ष को गलत नाम दिया जाता रहेगा। गलत नाम घाव को गहरा करता है। सही निदान तुरंत शांति नहीं लाता, लेकिन किसी भी ईमानदार समाधान की पहली शर्त वही है। दुनिया को मणिपुर को मणिपुर की शर्तों पर समझना होगा। उसका दुख वास्तविक है। उसका इतिहास जटिल है। उसके सभी समुदायों ने भय, क्षति और अनिश्चितता झेली है।