यह संतोष की बात है कि वर्ष 2026 की पहली छमाही में दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पत्रकारों की हत्या के मामलों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। 1 जनवरी से 30 जून 2026 के बीच इस व्यापक क्षेत्र में मीडिया से जुड़े लोगों की मौत के केवल छह मामले सामने आए हैं। इसके विपरीत, वर्ष 2025 में इन देशों में पत्रकारों की हत्या के कम-से-कम 21 मामले दर्ज किए गए थे—भारत में 6, बांग्लादेश में 5, पाकिस्तान में 5, फिलीपींस में 4, अफ़गानिस्तान में 2 और नेपाल में 1।
2026 में पत्रकारों की हत्या में कमी, सुरक्षा की चुनौतियां बरकरार
2026 की पहली छमाही में दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया में पत्रकारों की हत्या के मामलों में कमी आई, लेकिन मीडिया सुरक्षा, न्याय और पीड़ित परिवारों के मुआवजे की चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं।
वर्ष 2026 में 30 जून तक फिलीपींस तीन पत्रकारों की हत्या के साथ इस सूची में सबसे ऊपर है। इनमें जूलियो कैलो (DNN न्यूज़ FM), आरजे निकोल लेडेस्मा (पघिमुताद-नेग्रोस) और नेस्टर मिकेटर (एम्पायर रेडियो स्टेशन) शामिल हैं। वहीं भारत में जगनमोहन रेड्डी (ABN आंध्र ज्योति), पाकिस्तान में लाला इसराफिल खान (HUM न्यूज़ चैनल) और बांग्लादेश में राणा प्रताप बैरागी (दैनिक BD खबर) की एक-एक हत्या दर्ज की गई।
कभी अत्यंत अशांत क्षेत्र माने जाने वाले भारत के सुदूर पूर्वी हिस्से, यानी उत्तर-पूर्व, ने पिछले आठ वर्षों से अधिक समय से पत्रकारों की हत्या का कोई मामला दर्ज न होने का उल्लेखनीय रिकॉर्ड कायम रखा है। तीन दशकों के दौरान इस क्षेत्र ने हमलावरों के हाथों 30 से अधिक संपादकों, रिपोर्टरों और संवाददाताओं को खोया था। लगभग 6 करोड़ की आबादी वाले इस क्षेत्र में पत्रकार की हत्या का आखिरी मामला वर्ष 2017 में सामने आया था।
एक अरब से अधिक आबादी वाले भारत में सामान्यतः हर वर्ष पाँच से दस पत्रकारों की हत्या के मामले दर्ज किए जाते हैं। हालांकि वर्ष 2026 में अब तक केवल एक पत्रकार की हत्या की घटना सामने आई है। यह दुखद घटना आंध्र प्रदेश में 28 अप्रैल को हुई, जब 40 वर्षीय जगनमोहन हमले का शिकार बने। इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन (IJU) सहित विभिन्न पत्रकार संगठनों ने इस घटना के विरोध में प्रदर्शन किए और कार्यरत पत्रकारों की सुरक्षा तथा प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए प्रभावी नीतियाँ लागू करने की मांग की।
जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड) स्थित वैश्विक मीडिया सुरक्षा एवं अधिकार संस्था प्रेस एम्बलम कैंपेन (PEC) ने भी जगनमोहन के लिए न्याय की मांग की। PEC के अनुसार, वह वर्ष 2026 में दुनिया भर में मारे गए मीडिया कर्मियों में 28वें व्यक्ति थे।
समग्र तस्वीर के विपरीत, उत्तर-पूर्व भारत अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति प्रस्तुत करता है। इस क्षेत्र में पत्रकार की आखिरी हत्या त्रिपुरा में माणिक सरकार के नेतृत्व वाली वाम सरकार के कार्यकाल के दौरान हुई थी, जब दो पत्रकार—शांतनु भौमिक और सुदीप दत्ता भौमिक—की अलग-अलग घटनाओं में हत्या कर दी गई थी। इससे पहले वर्ष 2013 में त्रिपुरा में ही तीन मीडियाकर्मियों—सुजीत भट्टाचार्य, रंजीत चौधरी और बलराम घोष—की एक साथ हत्या कर दी गई थी। अगरतला में एक बंगाली अख़बार के कार्यालय के भीतर हुई इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था।
इसके एक वर्ष पहले असम में युवा पत्रकार रेहानुल नयुम की हत्या हुई थी, जब राज्य में तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी। इसी अवधि में मणिपुर में अपराधियों ने पत्रकार द्विजमणि नानाओ सिंह की हत्या कर दी थी, जब राज्य के मुख्यमंत्री कांग्रेस नेता ओकराम इबोबी सिंह थे। वर्ष 1987 से 2012 के बीच अकेले असम में 25 से अधिक मीडियाकर्मियों की हत्या दर्ज की गई।
इस बीच, उत्तर-पूर्व भारत में कोविड-19 महामारी ने भी मीडिया जगत को गहरा आघात पहुँचाया। महामारी के दौरान इस क्षेत्र में 20 से अधिक मीडियाकर्मियों की मृत्यु हुई। सबसे अधिक प्रभावित असम रहा, जबकि अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिज़ोरम और सिक्किम से किसी भी पत्रकार की कोरोना संक्रमण से मृत्यु की सूचना नहीं मिली।
पूर्वोत्तर के कोरोना पीड़ित पहले पत्रकार रंटू दास को 3 जुलाई 2020 को मृत घोषित किया गया। इसके बाद कोरोना संक्रमण की जटिलताओं के कारण गुवाहाटी में उदलगुरी के ग्रामीण संवाददाता धनेश्वर राभा, सिलचर के पत्रकार असीम दत्ता तथा रेडियो समाचार प्रस्तोता गोलाप सैकिया का निधन हो गया। गंभीर बीमारियों के चलते गुवाहाटी में असम ने दो प्रतिष्ठित मीडिया हस्तियों—डॉ. लक्ष्मी नंदन बोरा और होमेन बोरगोहेन—को भी खो दिया।
कोरोना महामारी में शहर के युवा लेखक आयुषमान दत्ता, मोरन के जादू चुटिया, चायगांव के शिवचरण कलिता, बोकाजन के रुबुल डिहिंगिया और नागांव के हुमेश्वर हीरा भी जान गंवाने वालों में शामिल रहे। नई दिल्ली में रहने वाली असमिया पत्रकार नीलाक्षी भट्टाचार्य और उनके पति कल्याण बरुआ की कुछ ही घंटों के अंतराल में कोरोना संक्रमण से मृत्यु हो गई। दिल्ली में उपचार के दौरान पत्रकार अनिर्बान बोरा का भी निधन हो गया।
त्रिपुरा में जितेंद्र देबबर्मा, तन्मय चक्रवर्ती, गौतम दास और माणिक लाल दास की मृत्यु दर्ज की गई, जबकि मणिपुर ने सगोलसेम हेमंत, सैकहोम शांति कुमार, थोटशांग शाइज़ा और लैरेनजाम बिजेन सिंह जैसे पत्रकारों को महामारी में खो दिया।
हालाँकि नई दिल्ली स्थित केंद्र सरकार और कुछ राज्य सरकारों ने कोरोना से दिवंगत पत्रकारों के परिवारों को मुआवज़ा देने की पहल की, लेकिन उत्तर-पूर्व के किसी भी राज्य ने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाया। असम सरकार ने प्रारंभ में घोषणा की थी कि कोरोना से प्रभावित मीडियाकर्मियों को अन्य फ्रंटलाइन योद्धाओं के साथ 50 लाख रुपये की जीवन बीमा योजना के लाभार्थियों में शामिल किया जाएगा, लेकिन दिवंगत पत्रकारों के परिवारों को मुआवज़ा देने के अपने वादे पर बाद में पूरी तरह मौन रही।
वर्षों तक पत्रकारों को हिंसा से बचाने के मामले में सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करने वाले उत्तर-पूर्व के लिए कोविड-19 महामारी एक ऐसी त्रासदी साबित हुई, जिसने इस क्षेत्र के मीडिया इतिहास पर एक स्थायी काला धब्बा छोड़ दिया।
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