भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थित गुवाहाटी आने वाले लाखों श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों की यात्रा माता कामाख्या मंदिर के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है। कामरूप सभ्यता की समृद्ध विरासत से जुड़ा यह पवित्र शक्तिपीठ विशाल ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिणी तट पर नीलाचल पहाड़ियों की चोटी पर स्थित है। आज गुवाहाटी भले ही एक आधुनिक शहर के रूप में पहचाना जाता हो, लेकिन कभी कामरूप एक विशाल साम्राज्य था, जिसके अंतर्गत पूर्वी भारत के अनेक क्षेत्र और वर्तमान उत्तरी बांग्लादेश का बड़ा हिस्सा शामिल था।
माँ कामाख्या मंदिर में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले प्रमुख धार्मिक आयोजनों में अंबुवाची मेला विशेष महत्व रखता है। यह पर्व देश-विदेश से लाखों सनातनी श्रद्धालुओं, साधु-संतों और तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है। इस पवित्र अवसर पर मंदिर का मुख्य द्वार चार दिनों के लिए बंद कर दिया जाता है। इस वर्ष अंबुवाची की ‘प्रवृत्ति’ 22 जून की दोपहर से शुरू होकर ‘निवृत्ति’ 26 जून की सुबह तक निर्धारित है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, अंबुवाची के दौरान धरती माता अपने वार्षिक रजस्वला चक्र से गुजरती हैं। यह काल प्रकृति के विश्राम और सृजन शक्ति के सम्मान का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण इस अवधि में मंदिर में कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं किया जाता। परंपरा के अनुसार, किसान भी इन दिनों खेती-बाड़ी का कार्य स्थगित रखते हैं, ताकि धरती माता को विश्राम मिल सके। देवी के रस्मी स्नान के बाद मंदिर के कपाट पुनः खोले जाते हैं और श्रद्धालु माँ कामाख्या के दर्शन तथा पूजा-अर्चना के लिए बड़ी संख्या में उमड़ पड़ते हैं।
कामाख्या मंदिर को देवी दुर्गा के 51 पवित्र शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि इसका निर्माण कामदेव ने भगवान विश्वकर्मा की सहायता से कराया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राक्षस राजा नरकासुर ने देवी कामाख्या से विवाह करने की इच्छा से मंदिर को पहाड़ी की तलहटी से जोड़ने वाले पत्थर के मार्ग ‘मेखेला उजोवा’ का निर्माण कराया था।
इतिहास में उल्लेख मिलता है कि पश्चिमी असम स्थित कूच बिहार के राजा कालापहाड़ ने वर्ष 1553 ईस्वी में इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। इसके बाद 17वीं शताब्दी में महाराजा विश्व सिंह ने मंदिर के पुनर्निर्माण और मरम्मत का कार्य कराया। उनके निधन के बाद कूच बिहार की गद्दी पर बैठे राजा नर-नारायण ने अपने भाई महावीर चिलाराय की सहायता से मंदिर के ऊपरी हिस्से का निर्माण करवाया। वर्तमान मंदिर और इसके आसपास के क्षेत्र का स्वरूप काफी हद तक नर-नारायण के शासनकाल में विकसित हुआ।
लोककथाओं के अनुसार, देवी सती शक्ति का ही स्वरूप थीं। राजा दक्ष द्वारा आयोजित महायज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया था। इसके बावजूद सती यज्ञ स्थल पर पहुँचीं, लेकिन वहाँ उनका सम्मान नहीं हुआ। राजा दक्ष द्वारा भगवान शिव का अपमान किए जाने से आहत होकर सती ने यज्ञ स्थल पर ही अपने प्राण त्याग दिए।
सती की मृत्यु का समाचार सुनकर भगवान शिव क्रोधित हो उठे। वे यज्ञ स्थल पर पहुँचे और दक्ष को दंडित करने के बाद सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर उठाकर तांडव करने लगे। यह तांडव कई दिनों तक चलता रहा और पूरी सृष्टि विनाश के कगार पर पहुँच गई।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सभी देवी-देवताओं ने भगवान विष्णु से हस्तक्षेप की प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने शिव को इस दुःख और क्रोध से मुक्त करने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से सती के पार्थिव शरीर के टुकड़े कर दिए। मान्यता है कि सती के शरीर के 51 भाग पृथ्वी के विभिन्न स्थानों पर गिरे और वे स्थान समय के साथ पवित्र शक्तिपीठों के रूप में पूजित हुए।
इसी मान्यता के अनुसार, देवी सती की योनि नीलाचल पहाड़ियों पर उस स्थान पर गिरी थी, जहाँ आज कामाख्या मंदिर स्थित है। संस्कृत के प्राचीन ग्रंथ ‘कालिका पुराण’ में माँ कामाख्या को भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली देवी के रूप में वर्णित किया गया है।
कामाख्या मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ देवी की कोई प्रतिमा नहीं है। गर्भगृह में प्राकृतिक गुफा के भीतर स्थित योनि की नक्काशीदार आकृति की पूजा की जाती है। यही इस शक्तिपीठ की आध्यात्मिक पहचान है।
आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण, प्रकृति के सम्मान और स्त्री-शक्ति की गरिमा की बात कर रही है, तब अंबुवाची मेला भारतीय सभ्यता की उस गहरी संवेदनशीलता को सामने लाता है, जिसमें धरती को माँ, प्रकृति को शक्ति और स्त्रीत्व को सृजन का आधार माना गया है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का आयोजन नहीं, बल्कि धरती, प्रकृति और स्त्री-शक्ति के प्रति सम्मान का जीवंत संदेश भी है।
जय माँ कामेश्वरी।