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    <title><![CDATA[Articles by Nava Thakuria | Purvottar Khabar]]></title>
    <link><![CDATA[https://www.purvottarkhabar.in/author/2]]></link>
    <description><![CDATA[Latest multi-category articles and blogs written by Nava Thakuria, published on Purvottar Khabar. Stay informed with trusted insights.]]></description>
    <managingEditor>blogger.naorem@gmail.com (Purvottar Khabar)</managingEditor>
    <webMaster>blogger.naorem@gmail.com (Purvottar Khabar)</webMaster>
    <copyright><![CDATA[Copyright: (C) Purvottar Khabar. All Rights Reserved.]]></copyright>
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    <lastBuildDate>Sun, 23 Aug 2026 05:01:23 GMT</lastBuildDate>
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      <title>Articles by Nava Thakuria | Purvottar Khabar</title>
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    <item>
      <title><![CDATA[काज़ीरंगा ESZ सीमा घटाने पर संरक्षण बनाम विकास की बहस]]></title>
      <description><![CDATA[<a href="https://www.purvottarkhabar.in/news/kaziranga-esz-boundary-reduction-conservation-development-debate"><img alt="काज़ीरंगा ESZ सीमा घटाने पर संरक्षण बनाम विकास की बहस" border="0" src="https://www.purvottarkhabar.in/view/aug-2026/kaziranga-assam.jpg"></a><p>असम सरकार के काज़ीरंगा नेशनल पार्क के आसपास ESZ सीमा 10 किमी से घटाकर 1-3 किमी करने के प्रस्ताव पर संरक्षण, विकास और स्थानीय आजीविका को लेकर बहस तेज हो गई है।</p>]]></description>
      <link><![CDATA[https://www.purvottarkhabar.in/news/kaziranga-esz-boundary-reduction-conservation-development-debate]]></link>
      <pubDate>Sun, 23 Aug 2026 05:01:23 GMT</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[Nava Thakuria]]></dc:creator>
      <category><![CDATA[कजरग ESZ]]></category>
      <category><![CDATA[Kaziranga ESZ]]></category>
      <category><![CDATA[कजरग नशनल परक]]></category>
      <category><![CDATA[Kaziranga National Park]]></category>
      <category><![CDATA[असम सरकर]]></category>
      <category><![CDATA[हमत बसव सरम]]></category>
      <category><![CDATA[गरव गगई]]></category>
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      <category><![CDATA[Eco Sensitive Zone]]></category>
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      <category><![CDATA[वनयजव सरकषण]]></category>
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      <category><![CDATA[सरकषण बनम वकस]]></category>
      <category><![CDATA[Kaziranga buffer zone]]></category>
      <category><![CDATA[Assam wildlife conservation]]></category>
      <category><![CDATA[ESZ boundary reduction]]></category>
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      <content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.purvottarkhabar.in/view/aug-2026/kaziranga-assam.jpg"> असम सरकार काज़ीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिज़र्व के आसपास एक विशेष इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ), यानी पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र, बनाने की योजना बना रही है। यह ज़ोन मौजूदा सीमा से 1 से 3 किलोमीटर तक फैला होगा और अभी लागू 10 किलोमीटर की सीमा की जगह लेगा। इस योजना को लेकर मुख्यधारा मीडिया और सोशल मीडिया, दोनों जगह बहस तेज हो गई है। हालांकि यह पहल भारत के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप बताई जा रही है, लेकिन विपक्षी दलों और वन्यजीव विशेषज्ञों के विरोध के बाद इस मुद्दे ने व्यापक ध्यान खींचा है।</p>
<p>अब तक UNESCO की इस विश्व धरोहर स्थल के लिए ESZ की सीमा तय नहीं की गई है, इसलिए इस प्रसिद्ध जैव-विविधता हॉटस्पॉट पर 10 किलोमीटर का बफर नियम लागू है। यह बहस तब और तेज हो गई, जब दिसपुर में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने हाल ही में घोषणा की कि वह नई दिल्ली में केंद्र सरकार से काज़ीरंगा ESZ बफर की सीमा घटाकर कम से कम 1 किलोमीटर करने का अनुरोध करेगी। संरक्षित क्षेत्रों के आसपास जरूरी बफर ज़ोन आमतौर पर बड़े निर्माण, शहरी विस्तार या खनन गतिविधियों पर रोक लगाता है, क्योंकि इन गतिविधियों से इंसान और वन्यजीवों के बीच टकराव बढ़ सकता है। कुछ विशेष मौकों पर वन्यजीव सीमा पार करके बफर ज़ोन में आ सकते हैं। काज़ीरंगा फॉरेस्ट रिज़र्व के मामले में कोई बाड़ या कंक्रीट की सीमा नहीं है और मानसून की बाढ़ के दौरान जानवर अक्सर नेशनल हाईवे-715, जिसे पहले NH-37 कहा जाता था, पार करके कार्बी आंगलोंग की पहाड़ियों तक पहुंचते हैं।</p>
<p>विपक्षी दलों और पर्यावरण के प्रति उत्साही कई लोगों ने सरकार के इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है, जिसमें डिफॉल्ट 10 किलोमीटर की सीमा को कम करने की बात कही गई है। उनका तर्क है कि इससे कई मौकों पर वन्यजीवों की सुरक्षा का मिशन खतरे में पड़ सकता है। असम कांग्रेस प्रमुख गौरव गोगोई ने ESZ प्रस्ताव का विरोध करते हुए तर्क दिया कि बफर ज़ोन कम होने से वन्यजीव जरूरी सुरक्षा से वंचित रह जाएंगे। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के नेताओं ने भी काज़ीरंगा ESZ को कम करने के कदम का विरोध किया और इसे वापस लेने की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि कोई भी ऐसी नीति, जो बड़े कॉरपोरेट समूहों के हितों के लिए काज़ीरंगा फॉरेस्ट रिज़र्व की सुरक्षा से समझौता करती हो, बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है।</p>
<p>हालांकि, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने काज़ीरंगा के आसपास ESZ सीमा को फिर से तय करने के प्रस्ताव का जोरदार बचाव किया और कहा कि सरकार का यह कदम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप है। सरमा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के मुताबिक ESZ कम से कम एक किलोमीटर सीमा से होना चाहिए और परिस्थितियों के हिसाब से इसे तीन किलोमीटर तक बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया में किसी भी फॉरेस्ट रिज़र्व के आसपास 10 किलोमीटर तक फैला ESZ नहीं होता है। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि ESZ का मतलब &lsquo;टूरिज्म इंफ्रास्ट्रक्चर न होना&rsquo; नहीं है, बल्कि यह खनन, रसायन से जुड़ी गतिविधियों और प्रदूषण फैलाने वाले दूसरे उद्योगों जैसी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए एक मुख्य गाइडलाइन है, जिनसे किसी संरक्षित इलाके की पारिस्थितिक अखंडता को नुकसान पहुंच सकता है।</p>
<p>इससे पहले, असम भाजपा अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने ESZ का दायरा कम करने के विरोध में कांग्रेस पार्टी की आलोचना की थी। उन्होंने दावा किया कि असम के तत्कालीन वन मंत्री रकीबुल हुसैन के कार्यकाल में 235 से अधिक कीमती गैंडों को मार दिया गया था। सैकिया ने कहा कि दिसपुर में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों ने गैंडों के अवैध शिकार की घटनाओं को काफी कम कर दिया है। असम के मंत्री पीयूष हजारिका ने भी कहा कि इस कदम से, यानी ESZ की सीमा तय करने से, काज़ीरंगा के आसपास पर्यावरण संरक्षण की पहल कमजोर नहीं होगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार 10 किलोमीटर का एक जैसा बफर ज़ोन लागू करने के बजाय वैज्ञानिक रूप से आंकी गई और जगह के हिसाब से तय 1-3 किलोमीटर की ESZ चाहती है।</p>
<p>दिलचस्प बात यह है कि कुछ स्थानीय निवासी भी जगह के हिसाब से बफर ज़ोन बनाने के प्रस्ताव का समर्थन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि काज़ीरंगा के आसपास के गांवों को अक्सर विकास से जुड़ी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी आजीविका के अवसर सीमित हो जाते हैं। ESZ की सीमा कम करने के समर्थन में कई प्रदर्शन करते हुए इन स्थानीय लोगों ने कहा कि विकास और संरक्षण की पहल एक-दूसरे के साथ मिलकर चलनी चाहिए, न कि आपस में टकरानी चाहिए। उनका यह भी मानना है कि नई ESZ सीमा लागू करते समय पर्यावरण पर पड़ने वाले असर का व्यापक आकलन किया जा सकता है।</p>
<p>उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी नीतिगत फैसले के लिए काज़ीरंगा के आसपास रहने वाले समुदायों की राय अहम होनी चाहिए, क्योंकि वे दशकों से काज़ीरंगा के वन्यजीवों की सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण हिस्सेदार की भूमिका निभा रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[असम की बाढ़: बारिश के साथ नागालैंड में पर्यावरणीय क्षति पर उठे सवाल]]></title>
      <description><![CDATA[<a href="https://www.purvottarkhabar.in/news/assam-flood-rain-nagaland-environmental-damage-questions"><img alt="असम की बाढ़: बारिश के साथ नागालैंड में पर्यावरणीय क्षति पर उठे सवाल" border="0" src="https://www.purvottarkhabar.in/view/aug-2026/assam-flood-rain-nagaland-environmental-damage-questions.jpg"></a><p>असम में जुलाई 2026 की विनाशकारी बाढ़ के बाद नागालैंड की पहाड़ियों में अवैध कोयला, पत्थर और रेत खनन तथा वनों की कटाई की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे हैं।</p>]]></description>
      <link><![CDATA[https://www.purvottarkhabar.in/news/assam-flood-rain-nagaland-environmental-damage-questions]]></link>
      <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 03:20:17 GMT</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[Nava Thakuria]]></dc:creator>
      <category><![CDATA[असम क बढ 2026]]></category>
      <category><![CDATA[असम बढ]]></category>
      <category><![CDATA[नगलड परयवरणय कषत]]></category>
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      <category><![CDATA[असम नगलड बढ]]></category>
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      <category><![CDATA[कयल खनन नगलड]]></category>
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      <category><![CDATA[नगलड म वन क कटई]]></category>
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      <category><![CDATA[असम बढ रहत]]></category>
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      <category><![CDATA[बरहमपतर क सहयक नदय]]></category>
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      <content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.purvottarkhabar.in/view/aug-2026/assam-flood-rain-nagaland-environmental-damage-questions.jpg"> जैसे-जैसे पूर्वी असम में बाढ़ का पानी कम हो रहा है और सरकार हजारों प्रभावित परिवारों को फिर से बसाने की कोशिशें शुरू कर रही है, ध्यान धीरे-धीरे ऊपर की ओर नागा पहाड़ियों पर जा रहा है। जुलाई 2026 के दूसरे हिस्से में यहां हुई बेतहाशा बारिश से असम के कई जिलों&mdash;जैसे शिवसागर, चराइदेव, गोलाघाट और जोरहाट&mdash;में भयानक बाढ़ आ गई।</p>
<p>नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र की कई सहायक नदियां अपने साथ गाद और मिट्टी वाला पानी लेकर असम पहुंचीं। इससे हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि डूब गई, लाखों पालतू जानवर और मुर्गियां बह गईं तथा सैकड़ों स्थानीय परिवारों को बेघर होना पड़ा। 2 अगस्त तक असम में आई बाढ़ की इस ताजा लहर में बच्चों समेत 82 लोगों की जान जा चुकी थी और कुछ लोग अभी भी लापता हैं। हजारों परिवार अब भी बाढ़ प्रभावित इलाकों में बने सैकड़ों राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। इनमें से ज्यादातर लोगों के घर, फसलें और पालतू जानवर, जिनमें मुर्गियां भी शामिल हैं, पहले ही बर्बाद हो चुके हैं।</p>
<p>हालांकि 18 से 22 जुलाई के दौरान असम, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में हुई भारी बारिश, जो 137 मिमी तक दर्ज की गई, इस आपदा का मुख्य कारण थी, लेकिन पहाड़ी इलाकों में इंसानों द्वारा पर्यावरण को पहुंचाए गए नुकसान ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया। पूर्वी असम की प्रमुख नदियों&mdash;जैसे दिखो, दिसांग, दारिका और जांजी&mdash;में अचानक पानी और गंदगी का तेज बहाव आया। यह बहाव नदी की क्षमता से कहीं अधिक था और आखिरकार कई जगहों पर तटबंध टूट गए।&nbsp;</p>
<p>खबरों के मुताबिक, नागालैंड सरकार ने दिसपुर प्रशासन को संभावित आपदा के बारे में तुरंत चेतावनी दी थी, लेकिन असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण शायद स्थिति की गंभीरता को नहीं समझ पाया। बचाव के लिए तत्काल कदम उठाने वाले प्रभावी आंतरिक चेतावनी तंत्र की कमी और जिला प्रशासनों, खासकर शिवसागर और चराइदेव, की तैयारी न होने से आपदा और भी विकराल हो गई।</p>
<p>राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असम में हुई तबाही पर चिंता जताई और मारे गए लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त की। प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में नई दिल्ली में असम के नेताओं&mdash;जिनमें केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल तथा राज्य भाजपा अध्यक्ष दिलीप सैकिया शामिल थे&mdash;के साथ बाढ़ की स्थिति की समीक्षा की। कुछ दिन पहले उन्होंने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से फोन पर बात की और असम के बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए केंद्र सरकार की ओर से हर संभव मदद का भरोसा दिलाया।&nbsp;</p>
<p>गृह मंत्री शाह ने भी बाढ़ की स्थिति का जायजा लेने के लिए सरमा से बात की और राहत, बहाली तथा पुनर्निर्माण के कामों में हर जरूरी मदद का भरोसा दिलाया। इस बीच, पूर्वी असम में बाढ़ से हुए नुकसान का आकलन करने आई छह सदस्यीय अंतर-मंत्रालयी केंद्रीय समीक्षा टीम ने अपना काम पूरा कर लिया है। टीम के सदस्यों को असम और नागालैंड में पिछले कुछ हफ्तों में हुई बेतहाशा भारी बारिश से हुए बड़े नुकसान के बारे में जानकारी दी गई। असम सरकार ने बाढ़ से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए केंद्र से एक विशेष पैकेज की मांग की है।</p>
<p>असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, जिन्होंने पहले दिन से ही बचाव और राहत कार्यों की कमान संभाली थी, ने हाल ही में प्रभावित परिवारों के लिए कई राहत उपायों की घोषणा की, जिसमें अपनों को खोने वालों के लिए अतिरिक्त आर्थिक मदद भी शामिल है। मृतकों के परिवारों को पहले घोषित चार लाख रुपये की अनुग्रह राशि के अलावा अब पांच लाख रुपये की अतिरिक्त राशि मिलेगी। इसके अलावा, बाढ़ से जुड़ी घटनाओं में लापता हुए लोगों, जो 30 दिनों से अधिक समय से लापता हैं, के परिवारों को भी चार लाख रुपये की मदद मिलेगी।&nbsp;</p>
<p>सरमा ने यह भी कहा कि बाढ़ से प्रभावित एक लाख से अधिक परिवारों को उनकी जरूरी जरूरतें पूरी करने के लिए तत्काल 15,000 रुपये प्रति परिवार दिए जाएंगे। प्रभावित इलाकों में रहने वाले 'अरुणोदय' योजना के लाभार्थियों और छात्रों को भी एकमुश्त आर्थिक मदद मिलेगी। प्रभावित परिवारों के लिए शिक्षा, वाहन, घर, कृषि आदि के लिए लिए गए ऋणों की अदायगी पर छह महीने की मोहलत, 19 जुलाई से प्रभावी, देने की भी घोषणा की गई। सरमा ने शिवसागर और चराइदेव जिलों में क्षतिग्रस्त नामघरों, यानी असमिया पारंपरिक प्रार्थना स्थलों, की मरम्मत के लिए भी प्रति नामघर 1.5 लाख रुपये देने की पेशकश की।</p>
<p>असम के राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य ने 30 जुलाई को बाढ़ प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण किया। राज्यपाल आचार्य ने प्रभावित परिवारों को भरोसा दिलाया कि संकट की इस घड़ी में सरकारी मशीनरी उनके साथ खड़ी है। उन्होंने जिला प्रशासन को निर्देश दिया कि राहत शिविरों में रह रहे बच्चों, महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और बुजुर्गों की जरूरतों पर विशेष ध्यान दिया जाए, ताकि उन्हें जरूरी मदद से वंचित न रहना पड़े।&nbsp;</p>
<p>भारत मौसम विज्ञान विभाग ने अगले कुछ दिनों में असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा में व्यापक बारिश का अनुमान जताया है। इससे पहले, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने चेतावनी दी थी कि बाढ़ का पानी उतरने के बाद प्रभावित गांवों में जलजनित और वेक्टर-जनित बीमारियों का प्रकोप फैल सकता है। परिषद ने अधिकारियों से परिवारों के लिए सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करने को कहा, ताकि टाइफाइड, पीलिया और पेचिश जैसी बीमारियों के प्रसार को रोका जा सके।</p>
<p>इस बीच, गुवाहाटी स्थित कई सैटेलाइट न्यूज चैनलों ने नागालैंड के मोन जिले में बड़े पैमाने पर कोयला, पत्थर और रेत खनन की गतिविधियों की रिपोर्ट दी, जिससे पूर्वी असम में बाढ़ की स्थिति और भी खराब होने की बात सामने आई। कई खबरों और चर्चाओं के जरिए इन न्यूज चैनलों ने नागा जंगलों के विनाश और कोयला खनन गतिविधियों को उजागर किया, जिससे जमीन की पानी सोखने की क्षमता कम हो गई।&nbsp;</p>
<p>कुछ पत्रकारों ने आपदा के दौरान नागा पहाड़ियों का दौरा किया और लगातार बारिश के बाद ऊंचे इलाकों की भयावह तस्वीर सामने रखी। उन्होंने बताया कि नागालैंड के मोन, मोकोकचुंग और लोंगलेन्ग जिलों में कई घंटों तक भारी बारिश हुई। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने इसे बादल फटने की घटना नहीं माना। इसके कारण असम की निचली नदियों&mdash;जैसे दिखो, दारिका, जांजी, भोगदोई आदि&mdash;का जलस्तर बढ़ गया और बड़े पैमाने पर तबाही मची। स्थानीय लोगों का कहना था कि उन्होंने अपने जीवनकाल में ऐसी भयानक बाढ़ कभी नहीं देखी।</p>
<p>नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो, जो अपने राज्य में खनन की समस्या से वाकिफ हैं, ने माना कि नागा परिवारों की जमीन के मालिकाना हक की अनोखी व्यवस्था के कारण सरकार कोई भी एहतियाती कदम नहीं उठा पाती है। रियो, जो भूविज्ञान और खनन मंत्रालय भी संभालते हैं, ने कोहिमा स्थित नागालैंड विधानसभा के सत्रों को संबोधित करते हुए बार-बार अवैध कोयला खनन पर चिंता जताई है। लेकिन नागालैंड में खनन गतिविधियों में सरकार की भूमिका मुख्य रूप से केवल राजस्व इकट्ठा करने तक ही सीमित है।&nbsp;</p>
<p>ध्यान देने वाली बात यह है कि संविधान के अनुच्छेद 371(ए) के तहत नागालैंड में जमीन और संसाधन वहां के लोगों के हैं और उनका संचालन प्रत्येक जनजाति के पारंपरिक कानूनों के तहत होता है। इसका फायदा उठाते हुए कई लोग अपनी जमीन पर ओपन-कास्ट या रैट-होल कोयला खनन की अनुमति देते हैं। आधिकारिक तौर पर वोखा, मोकोकचुंग, लोंगलेन्ग, तुएनसांग और मोन जिलों में 50 से अधिक लाइसेंस प्राप्त ऑपरेटर कोयला खनन का काम करते हैं, लेकिन अनौपचारिक खननकर्ताओं की संख्या इससे अधिक हो सकती है।</p>
<p>लेकिन यह मुद्दा असम सरकार से भी छिपा नहीं था, क्योंकि कांग्रेस के पूर्व विधायक देबब्रत सैकिया ने बार-बार दिखो नदी में बेरोकटोक पत्थर और रेत खनन का मुद्दा उठाया था। राज्य विधानसभा में विपक्ष के पूर्व नेता ने अलग-अलग सत्रों में नदी के तल से बड़े पैमाने पर पत्थर और रेत निकालने का मामला उठाया। हालांकि, दिसपुर में भारतीय जनता पार्टी की सरकार कोई ठोस कार्रवाई करने में नाकाम रही।</p>
<p>गौहाटी हाई कोर्ट ने 21 अक्टूबर 2019 को असम सरकार को एक समर्पित माइन्स एंड मिनरल्स टास्क फोर्स बटालियन और नदी संरक्षण के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाने का निर्देश दिया था, लेकिन सरकार ने नदी के तल पर अवैध खनन रोकने पर बहुत कम ध्यान दिया। चराइदेव जिले के नजीरा निर्वाचन क्षेत्र के विधायक के रूप में सैकिया ने राज्य के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, जिसका नेतृत्व प्रमिला रानी ब्रह्मा और उनके उत्तराधिकारी परिमल शुक्लबैद्य ने किया, को नदी के किनारे खनन गतिविधियों के खिलाफ चेतावनी देते हुए दो पत्र भी लिखे थे, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला।</p>
<p>असम के एक प्रभावशाली संगठन, 'असम सम्मिलित महासंघ' ने भी असम-नागालैंड सीमा पर कोयला, पत्थर और रेत खनन को रोकने में बरसों की लापरवाही के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया है, जिससे शिवसागर और चराइदेव जिलों में आपदा और गंभीर हो गई। दिखो नदी के तल से पत्थर निकालने से उसका प्राकृतिक बहाव बाधित हुआ और पहाड़ियों में बेरोकटोक मिट्टी के कटाव में योगदान मिला, जिससे बाढ़ और भी बदतर हो गई तथा लोगों की जान-माल के साथ-साथ निजी और सार्वजनिक संपत्तियों को भारी नुकसान पहुंचा। महासंघ के नेता मतिउर रहमान ने बताया कि दिखो नदी नागालैंड की नारुतो पहाड़ियों से निकलती है और असम में बहते हुए ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है।</p>
<p>&nbsp;उन्होंने कहा कि जब स्रोत वाले इलाकों में लगातार पर्यावरणीय नुकसान होता है, तो उसका असर असम की घाटी में भी दिखाई देता है। कई नदी विशेषज्ञों ने भी सार्वजनिक रूप से यह राय रखी कि नागा पहाड़ियों में अवैज्ञानिक तरीके से खनन के कारण बड़े पैमाने पर जंगल खत्म होने से भारी बारिश के दौरान गाद के साथ बहने वाले वर्षाजल की गति बढ़ गई, जिसके परिणामस्वरूप असम में अब तक की सबसे भीषण बाढ़ों में से एक आई।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[नागा पहाड़ियों में विकास परियोजनाएं और अवैध खनन: असम की बाढ़ त्रासदी का कारण]]></title>
      <description><![CDATA[<a href="https://www.purvottarkhabar.in/news/naga-hills-mining-development-assam-flood-crisis"><img alt="नागा पहाड़ियों में विकास परियोजनाएं और अवैध खनन: असम की बाढ़ त्रासदी का कारण " border="0" src="https://www.purvottarkhabar.in/view/july-2026/naga-hills-mining-development-assam-flood-crisis.jpg"></a><p>नागा पहाड़ियों में अवैध कोयला खनन, वनों की कटाई और अनियंत्रित विकास ने असम की बाढ़ को गंभीर बनाया। 61 मौतें और 7.45 लाख लोग प्रभावित।</p>]]></description>
      <link><![CDATA[https://www.purvottarkhabar.in/news/naga-hills-mining-development-assam-flood-crisis]]></link>
      <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 03:08:08 GMT</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[Nava Thakuria]]></dc:creator>
      <category><![CDATA[असम बढ 2026]]></category>
      <category><![CDATA[नग पहडय म अवध खनन]]></category>
      <category><![CDATA[नगलड कयल खनन]]></category>
      <category><![CDATA[असम बढ क करण]]></category>
      <category><![CDATA[नगलड म वन क कटई]]></category>
      <category><![CDATA[Assam Flood 2026]]></category>
      <category><![CDATA[Naga Hills Mining]]></category>
      <category><![CDATA[डयग जलवदयत परयजन]]></category>
      <category><![CDATA[बरहमपतर बढ]]></category>
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      <category><![CDATA[परयवरण वनश परवततर भरत]]></category>
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      <content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.purvottarkhabar.in/view/july-2026/naga-hills-mining-development-assam-flood-crisis.jpg"> पड़ोसी राज्य नागालैंड में हुई ज़बरदस्त बारिश ने असम के निचले इलाकों में कई दिनों तक भीषण बाढ़ की स्थिति पैदा कर दी। नागालैंड में कई वर्षों से चल रही विकास गतिविधियों के कारण वहां का पर्यावरण असंतुलित हो रहा है। इस बाढ़ के लिए केवल मॉनसून की भारी बारिश ही ज़िम्मेदार नहीं है, बल्कि नागा पहाड़ियों में कानूनी और अवैध कोयला खनन के कारण बड़े पैमाने पर हुई पेड़ों की कटाई भी एक बड़ी वजह है।</p>
<p>इस कटाई ने पूर्वी असम की नदियों के जल-प्रवाह तंत्र (हाइड्रोलॉजी) को चुपचाप बदल दिया है। कभी घने जंगलों से आच्छादित और वर्षा जल को सोखने वाली स्थिर पारिस्थितिकी वाले नागा क्षेत्र धीरे-धीरे बंजर भूमि में बदल गए हैं। ये भूमि अब अधिक समय तक वर्षा का पानी नहीं रोक पाती, जिससे कीचड़युक्त पानी तेज़ी से बहकर असम की घाटियों में पहुंच जाता है। इसी का परिणाम है कि असम के मुख्यतः पूर्वी जिलों में बाढ़ की वर्तमान लहर आई है।</p>
<p>इस ताज़ा बाढ़ में शनिवार तक कम से कम 61 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें कुछ बच्चे भी शामिल हैं, जबकि कई लोग अब भी लापता हैं। असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) के अनुसार, इस बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित जिला शिवसागर रहा, इसके बाद चराइदेव, जोरहाट, गोलाघाट, डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, होजई, नगांव, कार्बी आंगलोंग, विश्वनाथ, धेमाजी, कामरूप तथा कामरूप (मेट्रोपॉलिटन) जिले प्रभावित हुए। बाढ़ ने लगभग 935 गांवों में करीब 7.45 लाख लोगों को प्रभावित किया। इसमें लगभग 50,000 हेक्टेयर कृषि भूमि को नुकसान पहुंचा और 1.25 लाख से अधिक पालतू पशु (मुर्गी पालन के पक्षियों सहित) बह गए। संबंधित प्रशासन द्वारा कम से कम 250 बाढ़ राहत शिविर तथा अनेक राहत वितरण केंद्र स्थापित किए गए हैं।</p>
<p>राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF), राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF), सेना और वायु सेना के जवान स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों तथा स्वयंसेवकों के साथ मिलकर चौबीसों घंटे बचाव और राहत कार्य में जुटे हुए हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने विशेष रूप से राज्य के मंत्रियों&mdash;बिमल बोरा, सुशांत बोरगोहेन, पीयूष हजारिका, केशव महंता और अजंता नियोग&mdash;को ज़मीनी स्तर पर इन अभियानों की निगरानी करने का निर्देश दिया है। हालांकि, हज़ारों प्रभावित परिवार अब भी पेयजल और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी आवश्यक राहत सुविधाओं से वंचित हैं, क्योंकि बड़ी संख्या में तटबंधों, सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचों को भारी क्षति पहुंची है।</p>
<p>18 से 20 जुलाई के बीच नागालैंड और असम में लगातार भारी बारिश हुई, जबकि नागालैंड के मोन, मोकोकचुंग, लोंगलेंग और वोखा जिलों से वर्षा का पानी भारी मात्रा में मलबे के साथ बहकर नीचे आया। मोन जिले में 137 मिमी तक वर्षा दर्ज की गई और सोमवार को भूस्खलन में नौ लोगों की मौत हो गई। नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बाढ़ की स्थिति का जायजा लिया और पीड़ित परिवारों के लिए 70 लाख रुपये की अनुग्रह राशि जारी की। नागा पहाड़ियों से निकलने वाली अनेक नदियों के कारण असम के आसपास के गांवों में अभूतपूर्व बाढ़ आ गई। इसके बाद नागालैंड में NEEPCO द्वारा संचालित डोयांग जलविद्युत परियोजना से पानी छोड़े जाने से निचले इलाकों में स्थिति और अधिक गंभीर हो गई।</p>
<p>शुरुआत में यह माना गया था कि नागालैंड के पहाड़ी इलाकों में बादल फटने से असम के मैदानी क्षेत्रों में तबाही मची, लेकिन भारतीय मौसम विभाग ने ऐसी खबरों का खंडन किया। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह घटना बादल फटने की श्रेणी में नहीं आती, जिसके लिए किसी छोटे भौगोलिक क्षेत्र में एक घंटे के भीतर कम से कम 100 मिलीमीटर वर्षा दर्ज होना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि उन दिनों नागालैंड और असम में दैनिक वर्षा की मात्रा इस सीमा से कम थी। असम की जीवनरेखा, विशाल ब्रह्मपुत्र नदी, कई स्थानों पर खतरे के निशान से ऊपर बह रही है, जबकि इसकी प्रमुख सहायक नदियां&mdash;बुढ़ी दिहिंग, दिसांग, दिखौ, डोरिका, धनसिरी, भोगदोई और कुशियारा आदि&mdash;भी विभिन्न स्थानों पर उफान पर हैं।</p>
<p>असम के राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य ने राज्यभर में बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए चल रहे राहत कार्यों का जायजा लेने के लिए लोक भवन में इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी (IRCS) की असम इकाई के पदाधिकारियों के साथ एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की। सशक्त और सक्रिय प्रतिक्रिया की आवश्यकता पर बल देते हुए राज्यपाल आचार्य ने संबंधित पक्षों से अपने आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र को और प्रभावी बनाने का आग्रह किया। साथ ही, उन्होंने बाढ़ के बाद जलजनित तथा मच्छरों एवं अन्य कीटों से फैलने वाली बीमारियों के संभावित प्रकोप से निपटने के लिए एहतियाती उपाय अपनाने पर भी ज़ोर दिया।</p>
<p>केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने पूर्वी असम में बाढ़ की गंभीर स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की और राज्य सरकार को हरसंभव सहायता का आश्वासन दिया। उन्होंने बताया कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में असम की बाढ़ की स्थिति पर विस्तार से चर्चा की गई थी। सोनोवाल ने कहा कि केंद्र और असम सरकार स्थिति से निपटने के लिए निकट समन्वय बनाए हुए हैं। असम के पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि कृषि भूमि, पशुधन और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा है। उन्होंने दोहराया कि केंद्र सरकार असम के बाढ़ प्रभावित लोगों के राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण के लिए हरसंभव सहायता देती रहेगी।</p>
<p>केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी मुख्यमंत्री सरमा को फोन कर नई दिल्ली से हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया। उन्होंने यह भी बताया कि नुकसान का आकलन करने तथा आजीविका की पुनर्बहाली के लिए आवश्यक केंद्रीय सहायता निर्धारित करने के उद्देश्य से एक अंतर-मंत्रालयी केंद्रीय टीम असम का दौरा करेगी। इस बीच, मुख्यमंत्री सरमा ने संकट से निपटने के लिए चल रहे कार्यों की समीक्षा करने हेतु जिला आयुक्तों और अन्य संबंधित सरकारी अधिकारियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस की। इससे पहले उन्होंने चराइदेव, शिवसागर और जोरहाट जिलों के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर प्रभावित परिवारों से बातचीत की। असम सरकार ने बाढ़ में अपने परिजनों को खोने वाले प्रत्येक परिवार को चार-चार लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा पहले ही कर दी है।</p>
<p>हालांकि, असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई ने सरकार की अपर्याप्त प्रतिक्रिया की आलोचना करते हुए कहा कि पड़ोसी पूर्वोत्तर राज्यों के साथ उसका समन्वय बेहद कमजोर रहा है। बाढ़ प्रभावित अनेक क्षेत्रों का दौरा करते हुए जोरहाट के सांसद ने अधिकारियों से राहत और पुनर्वास कार्यों में तेजी लाने का आग्रह किया। असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के पुत्र ने दिसपुर में मौजूदा सरकार पर सड़कों और फ्लाईओवर के निर्माण को प्राथमिकता देने, लेकिन जल निकासी और बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रमों पर पर्याप्त ध्यान न देने का आरोप लगाया।</p>
<p>शिवसागर के विधायक अखिल गोगोई ने भी बाढ़ प्रभावित अनेक क्षेत्रों का दौरा करने के बाद सरकार से आपदा तैयारियों को और मजबूत करने की मांग की। उन्होंने यह भी दावा किया कि नागालैंड में बेतरतीब निर्माण गतिविधियों, अनियंत्रित खनन और जंगलों के विनाश ने असम में बाढ़ की स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया है।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[RSS कभी सूर्यास्त की ओर नहीं देखता, वह सूर्योदय की ऊर्जा के साथ जीता है: प्रो. राकेश सिन्हा]]></title>
      <description><![CDATA[<a href="https://www.purvottarkhabar.in/news/rss-never-looks-at-sunset-lives-with-sunrise-rakesh-sinha"><img alt="RSS कभी सूर्यास्त की ओर नहीं देखता, वह सूर्योदय की ऊर्जा के साथ जीता है: प्रो. राकेश सिन्हा" border="0" src="https://www.purvottarkhabar.in/view/july-2026/rss-never-looks-at-sunset-lives-with-sunrise-rakesh-sinha.jpg"></a><p>पूर्व राज्यसभा सदस्य प्रो. राकेश सिन्हा ने Guwahati में कहा कि RSS सत्ता से उचित दूरी रखते हुए समानता, सामाजिक एकता और राष्ट्रसेवा के विचारों पर आगे बढ़ता है।</p>]]></description>
      <link><![CDATA[https://www.purvottarkhabar.in/news/rss-never-looks-at-sunset-lives-with-sunrise-rakesh-sinha]]></link>
      <pubDate>Sun, 19 Jul 2026 11:20:39 GMT</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[Nava Thakuria]]></dc:creator>
      <category><![CDATA[RSS]]></category>
      <category><![CDATA[Rakesh Sinha]]></category>
      <category><![CDATA[Dr Keshav Baliram Hedgewar]]></category>
      <category><![CDATA[Rashtriya Swayamsevak Sangh]]></category>
      <category><![CDATA[RSS centenary]]></category>
      <category><![CDATA[Guwahati news]]></category>
      <category><![CDATA[Assam news]]></category>
      <category><![CDATA[Keshav Dham]]></category>
      <category><![CDATA[Paltan Bazar]]></category>
      <category><![CDATA[Purbottar Bharat Adhyayan Samuh]]></category>
      <category><![CDATA[Hindu unity]]></category>
      <category><![CDATA[Sanatani Hindu]]></category>
      <category><![CDATA[social harmony]]></category>
      <media:content xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://www.purvottarkhabar.in/view/july-2026/rss-never-looks-at-sunset-lives-with-sunrise-rakesh-sinha.jpg" medium="image" width="1200" height="675" />
      <content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.purvottarkhabar.in/view/july-2026/rss-never-looks-at-sunset-lives-with-sunrise-rakesh-sinha.jpg">&nbsp;</p>
<p class="isSelectedEnd"><strong>Guwahati, 18 जुलाई 2026:</strong> एक सदी पहले स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कभी सूर्यास्त की ओर नहीं देखता, बल्कि वह हमेशा उगते सूर्य की ऊर्जा, आशा और उत्साह के साथ आगे बढ़ता है। यह बात पूर्व राज्यसभा सदस्य प्रोफेसर राकेश सिन्हा ने शनिवार को कही।</p>
<p class="isSelectedEnd">Guwahati के Paltan Bazar स्थित Keshav Dham के Shankardev Hall में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रो. सिन्हा ने कहा कि डॉ. Keshav Baliram Hedgewar द्वारा स्थापित RSS अपने मूल विचारों और संगठनात्मक भावना के कारण सदैव युवा और ऊर्जावान बना रहेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd">उन्होंने कहा कि RSS सत्ता प्रतिष्ठान से उचित दूरी बनाए रखता है और उसका संचालन सत्ताधारियों के निर्देशों से प्रभावित नहीं होता।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रो. सिन्हा Purbottar Bharat Adhyayan Samuh द्वारा आयोजित कार्यक्रम में <strong>&ldquo;परम पूज्य डॉ. Hedgewar और संघ की शताब्दी यात्रा&rdquo;</strong> विषय पर व्याख्यान दे रहे थे।</p>
<p class="isSelectedEnd">डॉ. Hedgewar के व्यक्तित्व की विशेषता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि संघ के संस्थापक ने हमेशा संगठन को अपने व्यक्तिगत व्यक्तित्व से ऊपर रखा। डॉ. Hedgewar व्यक्तिगत प्रसिद्धि के पक्षधर नहीं थे और उन्होंने संघ की विचारधारा तथा संस्थागत स्वरूप को मजबूत करने पर जोर दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रो. सिन्हा ने कहा कि अगर डॉ. Hedgewar ने अपनी व्यक्तिगत छवि को बढ़ावा दिया होता, तो RSS आंदोलन एक व्यक्ति केंद्रित दर्शन बनकर रह जाता। इसके विपरीत, संगठन एक व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय दृष्टिकोण से संचालित सामूहिक आंदोलन के रूप में विकसित हुआ।</p>
<p class="isSelectedEnd"><em>Understanding RSS</em> और <em>Dr Keshav Baliram Hedgewar</em> पुस्तकों के लेखक प्रो. सिन्हा ने कहा कि संघ समाज को दो वर्गों में बांटने की सोच का समर्थन नहीं करता, बल्कि सभी व्यक्तियों के बीच समानता पर बल देता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">उन्होंने डॉ. Hedgewar को कर्मशील व्यक्ति बताते हुए कहा कि RSS से जुड़ी उनकी सभी गतिविधियों का उद्देश्य व्यापक मानव कल्याण था।</p>
<p class="isSelectedEnd">सनातनी हिंदुओं की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए प्रो. सिन्हा ने कहा कि भारत का बहुसंख्यक हिंदू समाज आज भी जाति, क्षेत्र और भाषा के आधार पर विभाजित है।</p>
<p class="isSelectedEnd">उन्होंने कहा कि इन आंतरिक विभाजनों ने बहुसंख्यक समाज को कमजोर किया है और इसके कारण हिंदुओं को अपनी ही भूमि पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रो. सिन्हा ने कहा कि जब तक हिंदू समाज की मानसिकता में बदलाव नहीं आएगा और आंतरिक सामाजिक दूरियां समाप्त नहीं होंगी, तब तक एक मजबूत और संगठित समाज का निर्माण संभव नहीं होगा।</p>
<p class="isSelectedEnd">उन्होंने यह भी कहा कि केवल बाहरी धार्मिक आक्रमण या दबाव के कारण उत्पन्न होने वाली एकता लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकती। सामाजिक एकता की नींव साझा सांस्कृतिक चेतना, सभ्यतागत पहचान और सामूहिक जिम्मेदारी पर आधारित होनी चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रो. सिन्हा ने प्रत्येक भारतीय से यह समझने का आह्वान किया कि सभी भारत माता की संतान हैं और इसी भावना के साथ देश को आगे ले जाना होगा।</p>
<p class="isSelectedEnd">कार्यक्रम का संचालन Uttar Asom Prant Prachar Pramukh Kishor Shivam ने किया। इस अवसर पर लगभग 100 प्रमुख व्यक्तियों ने भाग लिया।</p>
<p>RSS Mahanagar Sanghchalak Guru Prasad Medhi भी मंच पर उपस्थित रहे, जबकि प्रोफेसर Kalpana Bora ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[2026 में पत्रकारों की हत्या में कमी, सुरक्षा की चुनौतियां बरकरार]]></title>
      <description><![CDATA[<a href="https://www.purvottarkhabar.in/news/journalist-killings-decline-2026-media-safety-challenges"><img alt="2026 में पत्रकारों की हत्या में कमी, सुरक्षा की चुनौतियां बरकरार" border="0" src="https://www.purvottarkhabar.in/view/july-2026/journalist-killings-decline-2026-media-safety-challenges.jpg"></a><p>2026 की पहली छमाही में दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया में पत्रकारों की हत्या के मामलों में कमी आई, लेकिन मीडिया सुरक्षा, न्याय और पीड़ित परिवारों के मुआवजे की चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं।</p>]]></description>
      <link><![CDATA[https://www.purvottarkhabar.in/news/journalist-killings-decline-2026-media-safety-challenges]]></link>
      <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 14:32:28 GMT</pubDate>
      <guid isPermaLink="true">https://www.purvottarkhabar.in/news/journalist-killings-decline-2026-media-safety-challenges</guid>
      <dc:creator><![CDATA[Nava Thakuria]]></dc:creator>
      <category><![CDATA[पतरकर क हतय 2026]]></category>
      <category><![CDATA[पतरकर सरकष]]></category>
      <category><![CDATA[परस सवततरत]]></category>
      <category><![CDATA[मडय करमय क हतय]]></category>
      <category><![CDATA[दकषण एशय पतरकर]]></category>
      <category><![CDATA[दकषण परव एशय मडय]]></category>
      <category><![CDATA[उततर परव भरत पतरकर]]></category>
      <category><![CDATA[पतरकर पर हमल]]></category>
      <category><![CDATA[परस एमबलम कपन]]></category>
      <category><![CDATA[इडयन जरनलसटस यनयन]]></category>
      <category><![CDATA[कवड स पतरकर क मत]]></category>
      <category><![CDATA[मडय सरकष नत]]></category>
      <category><![CDATA[परवततर भरत समचर]]></category>
      <category><![CDATA[पतरकर मआवज]]></category>
      <category><![CDATA[अभवयकत क सवततरत]]></category>
      <media:content xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://www.purvottarkhabar.in/view/july-2026/journalist-killings-decline-2026-media-safety-challenges.jpg" medium="image" width="1200" height="675" />
      <content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.purvottarkhabar.in/view/july-2026/journalist-killings-decline-2026-media-safety-challenges.jpg"> यह संतोष की बात है कि वर्ष 2026 की पहली छमाही में दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पत्रकारों की हत्या के मामलों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। 1 जनवरी से 30 जून 2026 के बीच इस व्यापक क्षेत्र में मीडिया से जुड़े लोगों की मौत के केवल छह मामले सामने आए हैं। इसके विपरीत, वर्ष 2025 में इन देशों में पत्रकारों की हत्या के कम-से-कम 21 मामले दर्ज किए गए थे&mdash;भारत में 6, बांग्लादेश में 5, पाकिस्तान में 5, फिलीपींस में 4, अफ़गानिस्तान में 2 और नेपाल में 1।</p>
<div dir="auto">वर्ष 2026 में 30 जून तक फिलीपींस तीन पत्रकारों की हत्या के साथ इस सूची में सबसे ऊपर है। इनमें जूलियो कैलो (DNN न्यूज़ FM), आरजे निकोल लेडेस्मा (पघिमुताद-नेग्रोस) और नेस्टर मिकेटर (एम्पायर रेडियो स्टेशन) शामिल हैं। वहीं भारत में जगनमोहन रेड्डी (ABN आंध्र ज्योति), पाकिस्तान में लाला इसराफिल खान (HUM न्यूज़ चैनल) और बांग्लादेश में राणा प्रताप बैरागी (दैनिक BD खबर) की एक-एक हत्या दर्ज की गई।</div>
<div dir="auto">&nbsp;</div>
<div dir="auto">कभी अत्यंत अशांत क्षेत्र माने जाने वाले भारत के सुदूर पूर्वी हिस्से, यानी उत्तर-पूर्व, ने पिछले आठ वर्षों से अधिक समय से पत्रकारों की हत्या का कोई मामला दर्ज न होने का उल्लेखनीय रिकॉर्ड कायम रखा है। तीन दशकों के दौरान इस क्षेत्र ने हमलावरों के हाथों 30 से अधिक संपादकों, रिपोर्टरों और संवाददाताओं को खोया था। लगभग 6 करोड़ की आबादी वाले इस क्षेत्र में पत्रकार की हत्या का आखिरी मामला वर्ष 2017 में सामने आया था।</div>
<div dir="auto">&nbsp;</div>
<div dir="auto">एक अरब से अधिक आबादी वाले भारत में सामान्यतः हर वर्ष पाँच से दस पत्रकारों की हत्या के मामले दर्ज किए जाते हैं। हालांकि वर्ष 2026 में अब तक केवल एक पत्रकार की हत्या की घटना सामने आई है। यह दुखद घटना आंध्र प्रदेश में 28 अप्रैल को हुई, जब 40 वर्षीय जगनमोहन हमले का शिकार बने। इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन (IJU) सहित विभिन्न पत्रकार संगठनों ने इस घटना के विरोध में प्रदर्शन किए और कार्यरत पत्रकारों की सुरक्षा तथा प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए प्रभावी नीतियाँ लागू करने की मांग की।</div>
<div dir="auto">&nbsp;</div>
<div dir="auto">जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड) स्थित वैश्विक मीडिया सुरक्षा एवं अधिकार संस्था प्रेस एम्बलम कैंपेन (PEC) ने भी जगनमोहन के लिए न्याय की मांग की। PEC के अनुसार, वह वर्ष 2026 में दुनिया भर में मारे गए मीडिया कर्मियों में 28वें व्यक्ति थे।</div>
<div dir="auto">&nbsp;</div>
<div dir="auto">समग्र तस्वीर के विपरीत, उत्तर-पूर्व भारत अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति प्रस्तुत करता है। इस क्षेत्र में पत्रकार की आखिरी हत्या त्रिपुरा में माणिक सरकार के नेतृत्व वाली वाम सरकार के कार्यकाल के दौरान हुई थी, जब दो पत्रकार&mdash;शांतनु भौमिक और सुदीप दत्ता भौमिक&mdash;की अलग-अलग घटनाओं में हत्या कर दी गई थी। इससे पहले वर्ष 2013 में त्रिपुरा में ही तीन मीडियाकर्मियों&mdash;सुजीत भट्टाचार्य, रंजीत चौधरी और बलराम घोष&mdash;की एक साथ हत्या कर दी गई थी। अगरतला में एक बंगाली अख़बार के कार्यालय के भीतर हुई इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था।</div>
<div dir="auto">&nbsp;</div>
<div dir="auto">इसके एक वर्ष पहले असम में युवा पत्रकार रेहानुल नयुम की हत्या हुई थी, जब राज्य में तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी। इसी अवधि में मणिपुर में अपराधियों ने पत्रकार द्विजमणि नानाओ सिंह की हत्या कर दी थी, जब राज्य के मुख्यमंत्री कांग्रेस नेता ओकराम इबोबी सिंह थे। वर्ष 1987 से 2012 के बीच अकेले असम में 25 से अधिक मीडियाकर्मियों की हत्या दर्ज की गई।</div>
<div dir="auto">&nbsp;</div>
<div dir="auto">इस बीच, उत्तर-पूर्व भारत में कोविड-19 महामारी ने भी मीडिया जगत को गहरा आघात पहुँचाया। महामारी के दौरान इस क्षेत्र में 20 से अधिक मीडियाकर्मियों की मृत्यु हुई। सबसे अधिक प्रभावित असम रहा, जबकि अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिज़ोरम और सिक्किम से किसी भी पत्रकार की कोरोना संक्रमण से मृत्यु की सूचना नहीं मिली।</div>
<div dir="auto">&nbsp;</div>
<div dir="auto">पूर्वोत्तर के कोरोना पीड़ित&nbsp; पहले पत्रकार रंटू दास को 3 जुलाई 2020 को मृत घोषित किया गया। इसके बाद कोरोना संक्रमण की जटिलताओं के कारण गुवाहाटी में उदलगुरी के ग्रामीण संवाददाता धनेश्वर राभा, सिलचर के पत्रकार असीम दत्ता तथा रेडियो समाचार प्रस्तोता गोलाप सैकिया का निधन हो गया। गंभीर बीमारियों के चलते गुवाहाटी में असम ने दो प्रतिष्ठित मीडिया हस्तियों&mdash;डॉ. लक्ष्मी नंदन बोरा और होमेन बोरगोहेन&mdash;को भी खो दिया।</div>
<div dir="auto">&nbsp;</div>
<div dir="auto">कोरोना महामारी में शहर के युवा लेखक आयुषमान दत्ता, मोरन के जादू चुटिया, चायगांव के शिवचरण कलिता, बोकाजन के रुबुल डिहिंगिया और नागांव के हुमेश्वर हीरा भी जान गंवाने वालों में शामिल रहे। नई दिल्ली में रहने वाली असमिया पत्रकार नीलाक्षी भट्टाचार्य और उनके पति कल्याण बरुआ की कुछ ही घंटों के अंतराल में कोरोना संक्रमण से मृत्यु हो गई। दिल्ली में उपचार के दौरान पत्रकार अनिर्बान बोरा का भी निधन हो गया।</div>
<div dir="auto">&nbsp;</div>
<div dir="auto">त्रिपुरा में जितेंद्र देबबर्मा, तन्मय चक्रवर्ती, गौतम दास और माणिक लाल दास की मृत्यु दर्ज की गई, जबकि मणिपुर ने सगोलसेम हेमंत, सैकहोम शांति कुमार, थोटशांग शाइज़ा और लैरेनजाम बिजेन सिंह जैसे पत्रकारों को महामारी में खो दिया।&nbsp;</div>
<div dir="auto">&nbsp;</div>
<div dir="auto">हालाँकि नई दिल्ली स्थित केंद्र सरकार और कुछ राज्य सरकारों ने कोरोना से दिवंगत पत्रकारों के परिवारों को मुआवज़ा देने की पहल की, लेकिन उत्तर-पूर्व के किसी भी राज्य ने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाया। असम सरकार ने प्रारंभ में घोषणा की थी कि कोरोना से प्रभावित मीडियाकर्मियों को अन्य फ्रंटलाइन योद्धाओं के साथ 50 लाख रुपये की जीवन बीमा योजना के लाभार्थियों में शामिल किया जाएगा, लेकिन दिवंगत पत्रकारों के परिवारों को मुआवज़ा देने के अपने वादे पर बाद में पूरी तरह मौन रही।</div>
<div dir="auto">&nbsp;</div>
<div dir="auto">वर्षों तक पत्रकारों को हिंसा से बचाने के मामले में सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करने वाले उत्तर-पूर्व के लिए कोविड-19 महामारी एक ऐसी त्रासदी साबित हुई, जिसने इस क्षेत्र के मीडिया इतिहास पर एक स्थायी काला धब्बा छोड़ दिया।</div>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पासपोर्ट बहस के बीच क्या देशव्यापी NRC की तैयारी संभव है?]]></title>
      <description><![CDATA[<a href="https://www.purvottarkhabar.in/news/passport-citizenship-debate-nationwide-nrc-assam-experience"><img alt="पासपोर्ट बहस के बीच क्या देशव्यापी NRC की तैयारी संभव है?" border="0" src="https://www.purvottarkhabar.in/view/july-2026/passport-citizenship-debate-nationwide-nrc-assam-experience.jpg"></a><p>भारतीय पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण न मानने के बाद देशव्यापी NRC की संभावना पर बहस तेज हो गई है। असम NRC के विवाद, वित्तीय अनियमितताओं और पुनर्सत्यापन की मांग से क्या सबक लिया जाना चाहिए?</p>]]></description>
      <link><![CDATA[https://www.purvottarkhabar.in/news/passport-citizenship-debate-nationwide-nrc-assam-experience]]></link>
      <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 13:37:00 GMT</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[Nava Thakuria]]></dc:creator>
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      <content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.purvottarkhabar.in/view/july-2026/passport-citizenship-debate-nationwide-nrc-assam-experience.jpg">&nbsp;</p>
<p class="isSelectedEnd">भारतीय पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माने जाने संबंधी विदेश मंत्रालय की टिप्पणी ने देश में नागरिकता सत्यापन और संभावित देशव्यापी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स यानी NRC को लेकर नई बहस छेड़ दी है।</p>
<p class="isSelectedEnd">24 जून 2026 को आयोजित 14वें पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारतीय पासपोर्ट को मुख्य रूप से यात्रा दस्तावेज के रूप में देखा जाना चाहिए। मंत्रालय के अनुसार केवल पासपोर्ट के आधार पर किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता को अंतिम रूप से प्रमाणित नहीं माना जा सकता, क्योंकि वर्तमान कानूनों के अंतर्गत केंद्र सरकार विशेष परिस्थितियों में गैर नागरिकों को भी भारतीय पासपोर्ट जारी कर सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इस स्पष्टीकरण के सामने आने के बाद मुख्यधारा के मीडिया और सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई। लाखों लोगों के सामने स्वाभाविक सवाल खड़ा हुआ कि जब विस्तृत सत्यापन प्रक्रिया के बाद जारी होने वाला पासपोर्ट भी नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है, तो किसी भारतीय की नागरिकता आखिर किस दस्तावेज के आधार पर निर्धारित होगी?</p>
<p class="isSelectedEnd">इसी के साथ यह प्रश्न भी उठने लगा है कि क्या केंद्र सरकार आने वाले समय में देशव्यापी नागरिकता सत्यापन या NRC की दिशा में कोई नई पहल करने की तैयारी कर रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd">भारत में नागरिकता नागरिकता अधिनियम, 1955 के अंतर्गत निर्धारित होती है, जबकि पासपोर्ट पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के अनुसार जारी किए जाते हैं। दोनों का कानूनी उद्देश्य अलग है।</p>
<p class="isSelectedEnd">भारतीय नागरिकता जन्म, वंश, पंजीकरण, देशीयकरण या किसी क्षेत्र के भारत में शामिल किए जाने सहित विभिन्न आधारों पर प्राप्त की जा सकती है। अधिकांश भारतीय जन्म से नागरिक होते हैं। इस कारण उन्हें अलग से नागरिकता प्रमाणपत्र लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती।</p>
<p class="isSelectedEnd">भारत सरकार अपने सभी नागरिकों को कोई सार्वभौमिक नागरिकता प्रमाणपत्र भी जारी नहीं करती। ऐसे में पासपोर्ट को आम तौर पर नागरिकता से जुड़ा सबसे विश्वसनीय दस्तावेज माना जाता रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">हालांकि, पासपोर्ट अधिनियम के तहत विशेष परिस्थितियों में किसी गैर नागरिक को भी भारतीय पासपोर्ट जारी किया जा सकता है। इसलिए तकनीकी और कानूनी रूप से प्रत्येक भारतीय पासपोर्ट धारक का भारतीय नागरिक होना अनिवार्य नहीं है।</p>
<p class="isSelectedEnd">भारत की 1.4 अरब से अधिक आबादी में 10 प्रतिशत से भी कम लोगों के पास पासपोर्ट है। इसका अर्थ यह भी है कि पासपोर्ट को नागरिकता का अनिवार्य प्रमाण मानना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होगा।</p>
<p class="isSelectedEnd">केंद्र सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि आधार कार्ड, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और मतदाता पहचान पत्र में से किसी को भी अकेले भारतीय नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।</p>
<p class="isSelectedEnd">आधार पहचान और निवास से संबंधित दस्तावेज है। पैन कार्ड मुख्य रूप से कर व्यवस्था से जुड़ा है। ड्राइविंग लाइसेंस वाहन चलाने की अनुमति देता है, जबकि मतदाता पहचान पत्र चुनावी प्रक्रिया में मतदाता की पहचान के लिए उपयोग किया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इनमें से कोई भी दस्तावेज अपने आप में भारतीय नागरिकता का सार्वभौमिक और अंतिम प्रमाण नहीं है।</p>
<p class="isSelectedEnd">ऐसी स्थिति में यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि केंद्र सरकार भविष्य में नागरिकता के दावे को प्रमाणित करने के लिए किसी विशेष दस्तावेज या राष्ट्रीय रजिस्टर की व्यवस्था पर विचार कर सकती है। ऐसा दस्तावेज संभवतः NRC जैसी प्रक्रिया से मान्यता प्राप्त कर सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">लेकिन पूरे भारत के लिए NRC को अब तक अद्यतन नहीं किया गया है। यदि देशव्यापी NRC लागू करने पर विचार होता है, तो असम में हुई प्रक्रिया उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण और चेतावनी दोनों बनेगी।</p>
<p class="isSelectedEnd">असम में NRC अद्यतन की प्रक्रिया वर्ष 2015 से 2019 के बीच चलाई गई थी। इसका उद्देश्य 1951 के नागरिक रजिस्टर को अद्यतन करके राज्य में भारतीय नागरिकों और अवैध प्रवासियों की पहचान करना था।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में संचालित हुई, लेकिन इसके बावजूद वित्तीय अनियमितताओं, त्रुटिपूर्ण सत्यापन और कथित अवैध प्रवासियों के नाम नागरिक सूची में शामिल किए जाने जैसे गंभीर आरोप सामने आए।</p>
<p class="isSelectedEnd">सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 31 अगस्त 2019 को प्रकाशित सप्लीमेंट्री सूची को आज तक रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया ने औपचारिक रूप से प्रमाणित नहीं किया है। इसके बावजूद इसे अक्सर असम NRC की अंतिम सूची के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यदि पूरे देश में NRC अद्यतन की प्रक्रिया शुरू होती है, तो सरकार के लिए असम के अनुभवों की निष्पक्ष समीक्षा करना आवश्यक होगा। जिन त्रुटियों और विवादों ने असम की प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित किया, उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर दोहराने की अनुमति नहीं दी जा सकती।</p>
<p class="isSelectedEnd">असम NRC का पहला बड़ा मसौदा 30 जुलाई 2018 को प्रकाशित किया गया था। इसके बाद 31 अगस्त 2019 को सप्लीमेंट्री सूची जारी हुई, जिसमें 19 लाख से अधिक लोगों के नाम शामिल नहीं किए गए।</p>
<p class="isSelectedEnd">इस प्रक्रिया में लगभग 3.3 करोड़ लोगों ने भाग लिया था। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर 1951 के NRC को 25 मार्च 1971 की कट ऑफ तिथि के आधार पर अद्यतन किया गया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसका मुख्य उद्देश्य यह निर्धारित करना था कि कौन व्यक्ति निर्धारित तिथि से पहले असम या भारत में उपस्थित था और कौन उसके बाद अवैध तरीके से देश में आया।</p>
<p class="isSelectedEnd">इतने बड़े नागरिकता सत्यापन अभियान के लिए 50 हजार से अधिक सरकारी कर्मचारियों और लगभग छह हजार अंशकालिक कर्मियों को लगाया गया। केंद्र सरकार ने इस पूरी प्रक्रिया पर लगभग 1,600 करोड़ रुपये खर्च किए।</p>
<p class="isSelectedEnd">असम मेघालय कैडर के 1995 बैच के IAS अधिकारी प्रतीक हजेला को राज्य NRC का समन्वयक नियुक्त किया गया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">सप्लीमेंट्री सूची जारी होने के कुछ समय बाद ही असम में अपनी सुरक्षा को लेकर पैदा हुई आशंकाओं के बीच हजेला का तबादला उनके गृह राज्य मध्य प्रदेश कर दिया गया। बाद में मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने की अनुमति दे दी।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रतीक हजेला के बाद राज्य NRC समन्वयक बने सेवानिवृत्त IAS अधिकारी हितेश देवशर्मा ने पूरी प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप लगाए।</p>
<p class="isSelectedEnd">उनका आरोप था कि बड़ी संख्या में अवैध प्रवासियों, विशेष रूप से बांग्लादेश से आए मुस्लिम बसने वालों को सूची में शामिल करने के उद्देश्य से सॉफ्टवेयर प्रणाली में छेड़छाड़ की गई।</p>
<p class="isSelectedEnd">देवशर्मा ने यह भी दावा किया कि फैमिली ट्री मैचिंग जैसी महत्वपूर्ण सत्यापन प्रक्रिया से समझौता किया गया। इस प्रक्रिया का उद्देश्य एक ही पूर्वज या परिवार से नागरिकता का दावा करने वाले आवेदकों के दस्तावेज और पारिवारिक संबंधों की जांच करना था।</p>
<p class="isSelectedEnd">इन आरोपों के आधार पर उन्होंने प्रतीक हजेला और उनके सहयोगियों की भूमिका की जांच नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी और डायरेक्टरेट ऑफ एनफोर्समेंट से कराने की मांग की।</p>
<p class="isSelectedEnd">देवशर्मा की शिकायतों पर असम पुलिस ने अब तक कोई मामला दर्ज नहीं किया है। लेकिन वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित उनके आरोपों को नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट से भी बल मिला।</p>
<p class="isSelectedEnd">31 मार्च 2020 को समाप्त वित्त वर्ष से संबंधित अपनी रिपोर्ट में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने असम NRC अद्यतन प्रक्रिया के दौरान लगभग 260 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितताओं की ओर संकेत किया।</p>
<p class="isSelectedEnd">CAG ने तत्कालीन राज्य NRC समन्वयक प्रतीक हजेला और सिस्टम इंटीग्रेटर के रूप में कार्यरत विप्रो लिमिटेड के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश भी की थी।</p>
<p class="isSelectedEnd">असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि वर्ष 2019 में तैयार NRC त्रुटिपूर्ण था। उनका कहना है कि दोषपूर्ण नागरिक रजिस्टर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है और इससे असम के मूल निवासियों के हित प्रभावित हो सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">इससे स्पष्ट होता है कि असम NRC पर सवाल केवल किसी एक अधिकारी या संगठन ने नहीं उठाए। राज्य सरकार, पूर्व NRC समन्वयक और संवैधानिक लेखा संस्था के स्तर पर भी गंभीर आपत्तियां सामने आई हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने असम NRC के व्यापक पुनर्सत्यापन की मांग से जुड़ी एक रिट याचिका पर सुनवाई स्वीकार की है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह याचिका हितेश देवशर्मा ने अपनी व्यक्तिगत क्षमता और असम के बड़ी संख्या में मूल निवासियों के प्रतिनिधि के रूप में दाखिल की है। इसमें समयबद्ध सत्यापन के माध्यम से त्रुटिरहित और विश्वसनीय NRC तैयार करने की मांग की गई है।</p>
<p class="isSelectedEnd">सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार, असम सरकार, राज्य NRC समन्वयक और रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह घटनाक्रम उन आरोपों की गंभीरता को दर्शाता है जो उस प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों और संस्थाओं पर लगाए गए हैं, जिसका संचालन और निरीक्षण सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में हुआ था।</p>
<p class="isSelectedEnd">यदि भविष्य में देशव्यापी NRC लागू करने की दिशा में कोई कदम उठाया जाता है, तो असम के अनुभवों की निष्पक्ष और विस्तृत समीक्षा किए बिना आगे बढ़ना उचित नहीं होगा।</p>
<p class="isSelectedEnd">असम NRC प्रक्रिया के दौरान डेटा एंट्री ऑपरेटर के रूप में नियुक्त अस्थायी कर्मचारियों के भुगतान को लेकर भी गंभीर प्रश्न उठे।</p>
<p class="isSelectedEnd">इन कर्मचारियों को प्रति व्यक्ति लगभग 5,500 रुपये से 9,100 रुपये प्रतिमाह देने की पेशकश की गई थी। आरोप है कि यह राशि उस समय लागू न्यूनतम मजदूरी के कानूनी मानकों से भी कम थी।</p>
<p class="isSelectedEnd">दूसरी ओर, सिस्टम इंटीग्रेटर के रूप में कार्यरत विप्रो को प्रत्येक डेटा एंट्री ऑपरेटर के लिए लगभग 14,500 रुपये प्रतिमाह का भुगतान किया गया।</p>
<p class="isSelectedEnd">सिस्टम इंटीग्रेटर के वैध कमीशन को घटाने के बाद भी भुगतान में कथित हेराफेरी की कुल राशि एक अरब रुपये से अधिक होने का अनुमान लगाया गया। आरोप लगाया गया कि यह धन विप्रो या उसके सब कॉन्ट्रैक्टर इंटीग्रेटेड सिस्टम एंड सर्विसेज के पास गया।</p>
<p class="isSelectedEnd">इन आरोपों की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच आवश्यक है, क्योंकि नागरिकता जैसे संवेदनशील विषय से जुड़ी प्रक्रिया में वित्तीय जवाबदेही और प्रशासनिक पारदर्शिता दोनों महत्वपूर्ण हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">असम NRC से जुड़े विवादों के दौरान स्थानीय मीडिया के एक हिस्से की भूमिका भी आलोचना के घेरे में रही।</p>
<p class="isSelectedEnd">आरोप लगाया गया कि कुछ अपवादों को छोड़कर असम के अधिकांश मीडिया संस्थानों ने वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित मामलों को अपेक्षित गंभीरता से नहीं उठाया।</p>
<p class="isSelectedEnd">कई मीडियाकर्मी लगातार यह दावा करते रहे कि 31 अगस्त 2019 को प्रकाशित सप्लीमेंट्री सूची ही अंतिम NRC है और उसके बाद किसी प्रकार के सत्यापन या पुनर्सत्यापन की कोई संभावना नहीं है।</p>
<p class="isSelectedEnd">गुवाहाटी के एक टेलीविजन प्रस्तोता ने बिना किसी व्यापक पुनर्सत्यापन के उसी सूची को अंतिम रूप से स्वीकार करने की सार्वजनिक वकालत भी की थी।</p>
<p class="isSelectedEnd">बाद में सोशल मीडिया पर आरोप लगाया गया कि वह भी NRC अद्यतन प्रक्रिया के कथित लाभार्थियों में शामिल थे। हालांकि, अपने आक्रामक सार्वजनिक तेवरों के लिए पहचाने जाने वाले इस प्रस्तोता ने आरोपों पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी।</p>
<p class="isSelectedEnd">उन्होंने प्रतीक हजेला के काम की प्रशंसा करते हुए एक पुस्तक भी लिखी थी, जिसमें हजेला के कार्य को असाधारण उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया।</p>
<p class="isSelectedEnd">इन घटनाओं ने नागरिकता सत्यापन जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में मीडिया की निष्पक्षता, जिम्मेदारी और संभावित हितों के टकराव को लेकर भी सवाल खड़े किए।</p>
<p class="isSelectedEnd">असम में NRC अद्यतन केवल एक प्रशासनिक अभ्यास नहीं था। इसने नागरिकता, पहचान, मूल निवास, अवैध प्रवासन, राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े अनेक जटिल सवाल पैदा किए।</p>
<p class="isSelectedEnd">वित्तीय अनियमितताओं के आरोप, सॉफ्टवेयर और फैमिली ट्री सत्यापन पर उठे प्रश्न, CAG की टिप्पणियां, राज्य सरकार की आपत्तियां और सर्वोच्च न्यायालय में लंबित पुनर्सत्यापन की मांग बताती है कि इस प्रक्रिया की व्यापक समीक्षा अभी शेष है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यदि नई दिल्ली वास्तव में देशव्यापी NRC लागू करने की संभावना पर विचार कर रही है, तो उसे सबसे पहले असम के अनुभवों से सीखना होगा।</p>
<p class="isSelectedEnd">किसी भी राष्ट्रीय नागरिकता सत्यापन प्रक्रिया की विश्वसनीयता केवल उसके घोषित उद्देश्य से तय नहीं होगी। वह प्रक्रिया कितनी पारदर्शी, निष्पक्ष, जवाबदेह और त्रुटिरहित है, यह अधिक महत्वपूर्ण होगा।</p>
<p class="isSelectedEnd">असम का अनुभव बताता है कि न्यायिक निगरानी के अंतर्गत संचालित किसी प्रक्रिया में भी विवाद, प्रशासनिक त्रुटियां और गंभीर आरोप सामने आ सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसलिए भविष्य की किसी भी नागरिकता सत्यापन व्यवस्था में मजबूत सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होगी। ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी जिसमें वास्तविक भारतीय नागरिकों को केवल दस्तावेजों की कमी या प्रशासनिक गलती के कारण अपनी नागरिकता साबित करने के संकट से न गुजरना पड़े।</p>
<p class="isSelectedEnd">साथ ही, नागरिकता सत्यापन के राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े उद्देश्य भी कमजोर नहीं होने चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd">देशव्यापी NRC जैसे विशाल अभियान के लिए स्पष्ट कानूनी आधार, स्वीकार्य दस्तावेजों की पारदर्शी सूची, अपील की स्वतंत्र व्यवस्था, प्रशिक्षित कर्मचारी, सुरक्षित तकनीकी प्रणाली और वित्तीय जवाबदेही आवश्यक होगी।</p>
<p class="isSelectedEnd">एक निष्पक्ष और समयबद्ध जांच ही स्पष्ट कर सकती है कि असम NRC अद्यतन के दौरान वास्तव में क्या हुआ, कथित अनियमितताओं के लिए कौन जिम्मेदार था और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों को कैसे रोका जा सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह भी तय किया जाना चाहिए कि क्या वर्ष 2019 की सप्लीमेंट्री सूची को व्यापक पुनर्सत्यापन के बिना अंतिम नागरिक रजिस्टर के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यदि इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर नहीं मिलते, तो पूरे देश में NRC लागू करने की किसी भी संभावित पहल पर वही सवाल दोबारा खड़े होंगे जिनका सामना असम पिछले कई वर्षों से कर रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माने जाने की ताजा बहस ने भारत में एक सार्वभौमिक और विश्वसनीय नागरिकता प्रमाण प्रणाली की आवश्यकता को फिर सामने ला दिया है।</p>
<p>लेकिन देशव्यापी NRC की दिशा में बढ़ने से पहले असम में हुई गलतियों, विवादों और कथित अनियमितताओं का समाधान करना जरूरी है। अन्यथा नागरिकता सत्यापन की एक नई राष्ट्रीय प्रक्रिया भी विश्वास पैदा करने के बजाय आशंका, मुकदमेबाजी और सामाजिक असुरक्षा को जन्म दे सकती है।</p>]]></content:encoded>
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      <title><![CDATA[पासपोर्ट-बहस के बीच क्या देशव्यापी NRC की तैयारी संभव है]]></title>
      <description><![CDATA[<a href="https://www.purvottarkhabar.in/news/passport-citizenship-proof-nrc-debate-india"><img alt="पासपोर्ट-बहस के बीच क्या देशव्यापी NRC की तैयारी संभव है" border="0" src="https://www.purvottarkhabar.in/view/july-2026/passport-citizenship-proof-nrc-debate-india-assam.jpg"></a><p>विदेश मंत्रालय के बयान के बाद भारतीय पासपोर्ट, नागरिकता प्रमाण और NRC को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। असम NRC के अनुभव, विवाद और पुनर्सत्यापन की मांग राष्ट्रीय नागरिकता सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हैं।</p>]]></description>
      <link><![CDATA[https://www.purvottarkhabar.in/news/passport-citizenship-proof-nrc-debate-india]]></link>
      <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 17:06:36 GMT</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[Nava Thakuria]]></dc:creator>
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      <content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.purvottarkhabar.in/view/july-2026/passport-citizenship-proof-nrc-debate-india-assam.jpg"> बिना किसी उकसावे या किसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक बहस के, भारत के विदेश मंत्रालय ने दक्षिण एशिया के इस देश में नागरिकता के दावे के लिए पासपोर्ट को एक अपर्याप्त दस्तावेज़ बताकर नई बहस छेड़ दी। 24 जून 2026 को मनाए गए 14वें पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा कि भारतीय पासपोर्ट को मुख्य रूप से केवल यात्रा दस्तावेज़ के रूप में देखा जाना चाहिए। नागरिकता के लिए केवल भारतीय पासपोर्ट को ही अंतिम दस्तावेज़ नहीं माना जा सकता, क्योंकि मौजूदा कानूनों के तहत केंद्र सरकार विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी भारतीय पासपोर्ट जारी कर सकती है।</p>
<p>यह मुद्दा सामने आते ही मुख्यधारा और सोशल मीडिया में व्यापक चर्चा शुरू हो गई। लाखों लोग यह सवाल पूछने लगे कि यदि पासपोर्ट&mdash;जो आवश्यक सत्यापन प्रक्रियाओं के बाद जारी किया जाता है&mdash;भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, तो आखिर किसी भारतीय की नागरिकता किस आधार पर तय होगी? क्या आने वाले समय में देशव्यापी नागरिकता सत्यापन की दिशा में कोई नई पहल होने वाली है?</p>
<p>&nbsp;कानूनी तौर पर भारतीय नागरिकता नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत नियंत्रित होती है, जबकि पासपोर्ट पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के अनुसार जारी किए जाते हैं। भारत में नागरिकता को संविधान और नागरिकता कानूनों के माध्यम से परिभाषित किया गया है। इसे जन्म, वंश, देशीयकरण, पंजीकरण अथवा किसी क्षेत्र के भारत में विलय जैसे विभिन्न आधारों पर प्राप्त किया जा सकता है। अधिकांश भारतीय जन्म से ही नागरिक होते हैं और इसलिए उन्हें अलग से नागरिकता प्रमाण-पत्र की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसके अतिरिक्त, भारत अपने सभी नागरिकों के लिए कोई सार्वभौमिक नागरिकता प्रमाण-पत्र भी जारी नहीं करता। रिकॉर्ड के अनुसार भारत की 1.4 अरब से अधिक आबादी में 10 प्रतिशत से भी कम लोगों के पास पासपोर्ट है। इसके बावजूद नागरिकता के दावे के लिए इसे अब भी सबसे भरोसेमंद दस्तावेज़ माना जाता है। हालांकि, पासपोर्ट अधिनियम अधिकारियों को विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट जारी करने की अनुमति देता है।</p>
<p>&nbsp;इसलिए हर भारतीय पासपोर्ट धारक का भारतीय नागरिक होना आवश्यक नहीं है। सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि आधार, पैन, ड्राइविंग लाइसेंस और मतदाता पहचान-पत्र में से किसी को भी भारतीय नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। ऐसे में संकेत यही मिलता है कि नई दिल्ली भविष्य में नागरिकता के दावे के लिए किसी विशेष दस्तावेज़ की व्यवस्था पर विचार कर सकती है, जिसे नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न्स (NRC) से मान्यता प्राप्त हो। लेकिन पूरे देश में NRC को अभी अद्यतन किया जाना बाकी है।</p>
<p>असम में वर्ष 2015 से 2019 के बीच NRC अद्यतन की प्रक्रिया अनेक विवादों में घिरी रही। इसमें वित्तीय अनियमितताओं से लेकर बड़ी संख्या में कथित अवैध प्रवासियों को पूर्वोत्तर राज्य के मूल निवासी के रूप में सूचीबद्ध किए जाने तक के आरोप शामिल रहे। भले ही पूरी प्रक्रिया की निगरानी सर्वोच्च न्यायालय ने की थी, फिर भी अनेक गंभीर सवाल उठे। सबसे हैरानी की बात यह है कि NRC के अंतिम मसौदे को आज तक रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (RGI) ने प्रमाणित नहीं किया है।</p>
<p>यदि पूरे देश में NRC अद्यतन की प्रक्रिया शुरू की जाती है, तो सरकार के लिए असम के अनुभवों से सीख लेना अपरिहार्य होगा। राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि जिन त्रुटियों, विवादों और कथित अनियमितताओं ने असम की प्रक्रिया को प्रभावित किया, वे दोबारा न दोहराई जाएँ। विवाद तब शुरू हुआ जब 30 जुलाई 2018 को असम NRC का मसौदा (ड्राफ्ट) प्रकाशित हुआ और 31 अगस्त 2019 की आधी रात को इसकी सप्लीमेंट्री सूची जारी की गई, जिसमें 19 लाख से अधिक लोगों के नाम सूची से बाहर रह गए। इस प्रक्रिया में 3.3 करोड़ से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया था।</p>
<p>सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर असम के लिए 1951 के NRC को 25 मार्च 1971 की कट-ऑफ तिथि के आधार पर अद्यतन किया गया था, जिसका उद्देश्य अवैध नागरिकों की पहचान करना था। इस पूरी प्रक्रिया में 50,000 से अधिक सरकारी कर्मचारी और लगभग 6,000 पार्ट-टाइम कर्मी लगाए गए, जिस पर केंद्र सरकार ने लगभग 1,600 करोड़ रुपये खर्च किए। असम-मेघालय कैडर के 1995 बैच के IAS अधिकारी प्रतीक हजेला को राज्य NRC का समन्वयक नियुक्त किया गया था।</p>
<p>NRC की सप्लीमेंट्री सूची जारी होने के कुछ ही समय बाद, असम में अपनी सुरक्षा को लेकर पैदा हुई आशंकाओं के बीच उनका तबादला उनके गृह राज्य मध्य प्रदेश कर दिया गया। बाद में राज्य सरकार ने उन्हें स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेने की अनुमति भी दे दी। पहला बड़ा खुलासा हजेला के बाद राज्य NRC समन्वयक बने हितेश देवशर्मा ने किया। उन्होंने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में अवैध प्रवासियों, विशेषकर बांग्लादेशी मुस्लिम बसने वालों, को सूची में शामिल करने के उद्देश्य से सॉफ्टवेयर में छेड़छाड़ कर पूरी प्रक्रिया को प्रभावित किया गया। देवशर्मा, जो स्वयं सेवानिवृत्त IAS अधिकारी हैं, के अनुसार हजेला ने एक महत्वपूर्ण सत्यापन प्रक्रिया&mdash;फैमिली ट्री मैचिंग&mdash;से भी समझौता किया। इसी आधार पर उन्होंने हजेला और उनके सहयोगियों के विरुद्ध नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) तथा डायरेक्टरेट ऑफ एनफोर्समेंट (ED) से जांच कराने की मांग की।</p>
<p>देवशर्मा की कई शिकायतों पर असम पुलिस ने अब तक कोई मामला दर्ज नहीं किया है। हालांकि, वित्तीय अनियमितताओं को लेकर उनके आरोपों को उस समय बल मिला, जब भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने भी NRC अद्यतन प्रक्रिया के दौरान 260 करोड़ रुपये की वित्तीय गड़बड़ियों की ओर संकेत किया। 31 मार्च 2020 को समाप्त वर्ष की अपनी रिपोर्ट में CAG ने तत्कालीन राज्य NRC समन्वयक प्रतीक हजेला और सिस्टम इंटीग्रेटर के रूप में कार्यरत विप्रो लिमिटेड के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की भी सिफारिश की थी।</p>
<p>असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं कि NRC त्रुटिपूर्ण था। उनका कहना है कि दोषपूर्ण NRC राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है और इससे राज्य के मूल निवासियों के हित भी प्रभावित हो सकते हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने NRC के व्यापक पुनर्सत्यापन की मांग वाली एक रिट याचिका स्वीकार की है। इस याचिका में हितेश देवशर्मा ने, अपनी व्यक्तिगत क्षमता और असम के बड़ी संख्या में मूल निवासियों के प्रतिनिधि के रूप में, समयबद्ध सत्यापन के माध्यम से त्रुटिरहित NRC तैयार करने की मांग की है। सर्वोच्च न्यायालय पहले ही केंद्र सरकार, असम सरकार, राज्य NRC समन्वयक और रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (RGI) को नोटिस जारी कर जवाब मांग चुका है।</p>
<p>यह घटनाक्रम उन आरोपों की गंभीरता को भी रेखांकित करता है, जो ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध लगाए गए हैं, जिन्होंने उस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसका संचालन और बाद में निरीक्षण स्वयं सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में हुआ था। यदि भविष्य में पूरे देश में NRC लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया जाता है, तो असम में सामने आए इन अनुभवों और विवादों की निष्पक्ष समीक्षा किए बिना आगे बढ़ना उचित नहीं होगा। इस लंबी प्रक्रिया के दौरान एक और गंभीर पक्ष सामने आया। डेटा एंट्री ऑपरेटर (DEO) के रूप में नियुक्त अस्थायी कर्मचारियों को आज तक कानूनी मानकों के अनुरूप पारिश्रमिक नहीं मिल सका।</p>
<p>इन DEO को प्रति व्यक्ति 5,500 से 9,100 रुपये प्रतिमाह देने की पेशकश की गई थी, जो देश में निर्धारित न्यूनतम कानूनी मजदूरी से भी कम थी। इसके विपरीत, सिस्टम इंटीग्रेटर के रूप में कार्यरत विप्रो को प्रति DEO 14,500 रुपये प्रतिमाह का भुगतान किया गया। सिस्टम इंटीग्रेटर के वैध कमीशन को घटाने के बाद भी हेराफेरी की गई कुल राशि एक अरब रुपये से अधिक होने का अनुमान है, जो विप्रो अथवा उसके सब-कॉन्ट्रैक्टर 'इंटीग्रेटेड सिस्टम एंड सर्विसेज' की जेब में जानी चाहिए थी।</p>
<p>कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो असम का अधिकांश मीडिया इस पूरी प्रक्रिया में सामने आई वित्तीय अनियमितताओं की रिपोर्टिंग से बचता रहा। इतना ही नहीं, अधिकांश स्थानीय मीडियाकर्मी यह गलत जानकारी भी फैलाते रहे&mdash;इसके कारण वे स्वयं बेहतर जानते हैं&mdash;कि NRC की सप्लीमेंट्री सूची ही अंतिम सूची है और उसके बाद किसी प्रकार के सत्यापन की कोई गुंजाइश नहीं बची है। गुवाहाटी के कम-से-कम एक टेलीविजन होस्ट ने तो बिना किसी पुनर्सत्यापन के उसी सूची को अंतिम रूप में स्वीकार करने की खुलकर वकालत की।</p>
<p>बाद में सोशल मीडिया पर NRC अद्यतन प्रक्रिया के कथित लाभार्थियों में उनका नाम भी सामने आया और उनकी आलोचना हुई। हालांकि, अपने आक्रामक तेवरों के लिए पहचाने जाने के बावजूद उन्होंने उन आरोपों पर कभी कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी और आज तक मौन हैं। उन्होंने प्रतीक हजेला के कार्यों की प्रशंसा करते हुए एक पुस्तक भी लिखी, जिसमें उनके काम को बेमिसाल बताया गया। संभवतः इसका उद्देश्य टेक्नोक्रेट से ब्यूरोक्रेट बने हजेला को राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान दिलाना भी रहा हो।</p>
<p>यदि इन सभी घटनाक्रमों को समग्र रूप से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि असम में NRC अद्यतन केवल एक प्रशासनिक अभ्यास नहीं था, बल्कि ऐसी प्रक्रिया थी, जिसने अनेक गंभीर प्रश्न अनुत्तरित छोड़ दिए। वित्तीय अनियमितताओं के आरोप, सत्यापन प्रक्रिया पर उठे सवाल, CAG की टिप्पणियाँ, राज्य सरकार की आपत्तियाँ और अब सर्वोच्च न्यायालय में लंबित पुनर्सत्यापन की मांग&mdash;ये सभी संकेत देते हैं कि इस पूरी कवायद की निष्पक्ष और व्यापक समीक्षा अभी बाकी है। यदि नई दिल्ली वास्तव में पूरे देश में NRC लागू करने की दिशा में आगे बढ़ने पर विचार कर रही है, तो उसे सबसे पहले असम के अनुभवों से सीख लेनी होगी। किसी भी राष्ट्रीय नागरिकता सत्यापन प्रक्रिया की विश्वसनीयता केवल उसके उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शिता, निष्पक्षता, जवाबदेही और त्रुटिरहित क्रियान्वयन से तय होगी।</p>
<p>असम का अनुभव यह भी बताता है कि न्यायिक निगरानी में संचालित किसी प्रक्रिया में भी विवाद और गंभीर आरोप उभर सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि भविष्य में अपनाई जाने वाली किसी भी व्यवस्था में ऐसी सभी कमियों को दूर किया जाए, ताकि किसी भी भारतीय नागरिक के अधिकारों से समझौता न हो और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े उद्देश्यों पर भी कोई प्रश्नचिह्न न लगे। एक निष्पक्ष और समयबद्ध जांच ही यह स्पष्ट कर सकती है कि असम में NRC अद्यतन के दौरान वास्तव में क्या हुआ, कथित अनियमितताओं के लिए कौन जिम्मेदार था और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति कैसे रोकी जा सकती है।</p>
<p>यदि इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर नहीं मिलते, तो पूरे देश में NRC लागू करने की किसी भी संभावित पहल पर वही सवाल दोबारा खड़े होंगे, जिनका सामना असम पिछले कई वर्षों से करता आ रहा है।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[CNFF-2026: गुवाहाटी में भारतीय विरासत और देशभक्ति फिल्मों का राष्ट्रीय संगम]]></title>
      <description><![CDATA[<a href="https://www.purvottarkhabar.in/news/cnff-2026-guwahati-indian-heritage-patriotic-films-festival"><img alt="CNFF-2026: गुवाहाटी में भारतीय विरासत और देशभक्ति फिल्मों का राष्ट्रीय संगम" border="0" src="https://www.purvottarkhabar.in/view/june-2026/cnff-guwahati.jpg"></a><p>गुवाहाटी में 24 और 25 अक्टूबर 2026 को चलचित्रम नेशनल फिल्म फेस्टिवल का 10वां संस्करण आयोजित होगा, जिसमें भारतीय विरासत, देशभक्ति और सामाजिक सरोकारों पर आधारित लघु फिल्मों और डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया जाएगा।</p>]]></description>
      <link><![CDATA[https://www.purvottarkhabar.in/news/cnff-2026-guwahati-indian-heritage-patriotic-films-festival]]></link>
      <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 07:13:59 GMT</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[Nava Thakuria]]></dc:creator>
      <category><![CDATA[CNFF2026]]></category>
      <category><![CDATA[चलचतरम नशनल फलम फसटवल]]></category>
      <category><![CDATA[गवहट फलम फसटवल]]></category>
      <category><![CDATA[जयत चतरबन फलम ससइट]]></category>
      <category><![CDATA[भरतय वरसत]]></category>
      <category><![CDATA[दशभकत फलम]]></category>
      <category><![CDATA[लघ फलम]]></category>
      <category><![CDATA[डकयमटर]]></category>
      <category><![CDATA[परवततर भरत]]></category>
      <category><![CDATA[वशव सवद कदर असम]]></category>
      <category><![CDATA[भरतय चतर सधन]]></category>
      <category><![CDATA[समजक सरकर]]></category>
      <category><![CDATA[ससकतक रषटरवद]]></category>
      <category><![CDATA[फलम महतसव]]></category>
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      <content:encoded><![CDATA[<p class="isSelectedEnd"><strong><img src="https://www.purvottarkhabar.in/view/june-2026/cnff-guwahati.jpg"> गुवाहाटी, 28 जून:</strong> पूर्वोत्तर भारत के फिल्म प्रेमियों, समीक्षकों, फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों के लिए 24 और 25 अक्टूबर 2026 विशेष अवसर लेकर आ रहा है। इन दो दिनों में गुवाहाटी देशभक्ति, भारतीय सभ्यता, संस्कृति और विरासत पर आधारित फिल्मों के राष्ट्रीय संगम का साक्षी बनेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd">चलचित्रम नेशनल फिल्म फेस्टिवल (CNFF) का 10वां संस्करण गुवाहाटी के कहिलीपाड़ा स्थित ज्योति चित्रबन फिल्म सोसाइटी परिसर में आयोजित किया जाएगा। इस महोत्सव में चयनित लघु फिल्मों और डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया जाएगा। विश्व संवाद केंद्र-असम की सहयोगी संस्था चलचित्रम द्वारा आयोजित इस राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में प्रतिष्ठित फिल्म हस्तियों, समीक्षकों, फिल्मकारों और फिल्म प्रेमियों की उपस्थिति में चयनित प्रविष्टियों को ट्रॉफी, प्रमाणपत्र और नकद पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे।</p>
<p class="isSelectedEnd">भारतीय चित्र साधना के मार्गदर्शन में शुरू हुए इस महोत्सव की शुरुआत वर्ष 2017 में गुवाहाटी फिल्म फेस्टिवल के रूप में हुई थी। वर्ष 2019 में इसका नाम बदलकर चलचित्रम नेशनल फिल्म फेस्टिवल रखा गया और इसे &lsquo;हमारी विरासत, हमारा गौरव&rsquo; विषय के साथ नया स्वरूप दिया गया।</p>
<p class="isSelectedEnd">CNFF में भारतीय विरासत, स्थानीय समाज, स्वतंत्रता संग्राम के नायक, महाकाव्य और पौराणिक कथाएं, राष्ट्रीय एकता, कला और कलाकार, योग, ध्यान, आयुर्वेद, पांडुलिपियां, चित्रकला, पारिवारिक मूल्य, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, भूमि और जनजीवन, पर्यटन, हस्तशिल्प, वस्त्र उद्योग, लकड़ी की नक्काशी, संगीत, स्थानीय पर्व-त्योहार, पारंपरिक खेल, स्मारक और विरासत स्थल, समाज सुधारक, चाय और तेल उद्योग सहित अनेक विषयों पर आधारित फिल्मों को स्थान दिया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">महोत्सव में पुरस्कार विजेता फिल्मों का चयन कलाकारों, समीक्षकों, फिल्मकारों, लेखकों और अन्य विशेषज्ञों की जूरी द्वारा किया जाएगा। नॉर्थ-ईस्ट इंडिया कैटेगरी में सर्वश्रेष्ठ शॉर्ट फीचर, सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, पटकथा, सिनेमैटोग्राफी और संपादन सहित पांच पुरस्कार दिए जाएंगे। वहीं, ऑल इंडिया कैटेगरी में सर्वश्रेष्ठ शॉर्ट फीचर और सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री के लिए दो पुरस्कार निर्धारित किए गए हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">सभी श्रेणियां पेशेवर और नए फिल्मकारों के लिए समान रूप से खुली हैं। फिल्मों की अवधि 1 से 25 मिनट के बीच होनी चाहिए। इसके साथ ही फिल्मों का निर्माण 1 सितंबर 2025 से 1 सितंबर 2026 के बीच हुआ होना आवश्यक है।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रविष्टियों के लिए अर्ली बर्ड अवधि 10 से 30 जून तक रखी गई है, जिसके लिए कोई शुल्क नहीं होगा। रेगुलर डेडलाइन 1 से 20 जुलाई तक है, जिसके लिए 500 रुपये शुल्क निर्धारित है। फाइनल डेडलाइन 20 जुलाई से 2 सितंबर तक रहेगी, जिसके लिए 1,000 रुपये शुल्क देना होगा। प्रविष्टियां सीधे CNFF कार्यालय के ई-मेल <a href="mailto:chalachitramne@gmail.com">chalachitramne@gmail.com</a> या FilmFreeway के माध्यम से भेजी जा सकती हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">देशभर में आयोजित विभिन्न राष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों के बीच CNFF ने अपनी अलग पहचान बनाई है। यह आयोजन भारतीयता, सामाजिक प्रतिबद्धता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को सिनेमा के माध्यम से सामने लाने का एक प्रभावी मंच बन चुका है। पूर्वोत्तर भारत में यह महोत्सव विशेष रूप से उन फिल्मकारों को अवसर देता है, जो स्थानीय समाज, इतिहास, संस्कृति और जनजीवन से जुड़े विषयों को राष्ट्रीय पटल पर लाना चाहते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">पिछले यानी 9वें CNFF का उद्घाटन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के असम क्षेत्र प्रचार प्रमुख सुनील मोहंती ने भारत माता तथा डॉ. भूपेन हजारिका, जुबीन गर्ग और दीपक शर्मा के चित्रों के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया था। इस संस्करण में प्रतियोगिता और गैर प्रतियोगिता श्रेणी में 30 से अधिक लघु फीचर फिल्मों और डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया गया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">इन फिल्मों में वृद्धावस्था का अकेलापन, जीवन का उद्देश्य, मृत्यु की नई व्याख्या, परिवार के साथ शांतिपूर्ण जीवन की तलाश, आधुनिक जीवन के आकर्षण और भ्रम, पर्यावरण, भारत की हजारों वर्षों पुरानी सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत तथा अनेक समकालीन विषयों को संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया गया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">कुछ फिल्मों में शहरी क्षेत्रों में अकेले रह रहे बुजुर्ग पेशेवरों की चुनौतियों, लोककथाओं और लोकगीतों के माध्यम से मानसिक संबल, कमजोर होते पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक तनावों को रेखांकित किया गया। कई फिल्मों ने जाति आधारित सामाजिक संरचना और सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्षरत वंचित समुदायों की चुनौतियों को भी प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।</p>
<p class="isSelectedEnd">कुछ प्रविष्टियों ने धीमी गति से सीखने वाले और दिव्यांग बच्चों की दुनिया से दर्शकों को परिचित कराया। इसके माध्यम से उनके जीवन के भावनात्मक और संवेदनशील पहलुओं को समझने का अवसर मिला। मातृसत्तात्मक समाज में विवाह के बाद पुरुषों द्वारा अपना पैतृक परिवार छोड़ने की परंपरा, जादू-टोने से जुड़ी प्राचीन मान्यताएं, असम की पारंपरिक धागे वाली कठपुतली कला, भारत के प्राचीन वस्त्र उद्योग की विरासत और आधुनिक तकनीक से उत्पन्न चुनौतियां भी दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहीं।</p>
<p class="isSelectedEnd">कुछ फिल्मों में बदलती मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के कारण परिवार और रिश्तों से दूर होते युवाओं की समस्याओं को भी सामने रखा गया। साथ ही यह सकारात्मक संदेश भी दिया गया कि परिवार के निस्वार्थ प्रेम और स्नेह से युवा फिर से आत्मविश्वास प्राप्त कर सकते हैं और समाज के प्रति जिम्मेदारी तथा अपनत्व की भावना के साथ अपनी शिक्षा और भविष्य के करियर की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।</p>
<p>समापन समारोह में तत्कालीन असम विधानसभा अध्यक्ष बिस्वजीत दैमारी, अनेक फिल्म हस्तियां, गणमान्य अतिथि और बड़ी संख्या में फिल्म प्रेमी उपस्थित रहे थे। आयोजन समिति की ओर से विश्व संवाद केंद्र-असम के सचिव किशोर शिवम और CNFF के सचिव भगवत प्रीतम ने आशा व्यक्त की कि यह महोत्सव उभरते फिल्मकारों को सिनेमा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन, वंचित वर्गों के सशक्तिकरण और देशभक्ति की भावना को पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में सुदृढ़ करने के लिए प्रेरित करता रहेगा।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अंबुवाची मेला: धरती, प्रकृति और स्त्री-शक्ति का पवित्र पर्व]]></title>
      <description><![CDATA[<a href="https://www.purvottarkhabar.in/news/ambubachi-mela-kamakhya-temple-prakriti-stree-shakti"><img alt="अंबुवाची मेला: धरती, प्रकृति और स्त्री-शक्ति का पवित्र पर्व" border="0" src="https://www.purvottarkhabar.in/view/june-2026/ambubachi-mela-in-kamakhya.jpg"></a><p>गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर में मनाया जाने वाला अंबुवाची मेला धरती माता, प्रकृति और स्त्री-शक्ति के प्रति भारतीय सभ्यता की आस्था और संवेदनशीलता का प्रतीक है।</p>]]></description>
      <link><![CDATA[https://www.purvottarkhabar.in/news/ambubachi-mela-kamakhya-temple-prakriti-stree-shakti]]></link>
      <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 06:59:39 GMT</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[Nava Thakuria]]></dc:creator>
      <category><![CDATA[अबवच मल]]></category>
      <category><![CDATA[कमखय मदर]]></category>
      <category><![CDATA[म कमखय]]></category>
      <category><![CDATA[गवहट]]></category>
      <category><![CDATA[नलचल पहड]]></category>
      <category><![CDATA[शकतपठ]]></category>
      <category><![CDATA[धरत मत]]></category>
      <category><![CDATA[सतर शकत]]></category>
      <category><![CDATA[सनतन धरम]]></category>
      <category><![CDATA[असम धरमक परयटन]]></category>
      <category><![CDATA[कमरप सभयत]]></category>
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      <content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.purvottarkhabar.in/view/june-2026/ambubachi-mela-in-kamakhya.jpg">&nbsp;</p>
<p class="isSelectedEnd">भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थित गुवाहाटी आने वाले लाखों श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों की यात्रा माता कामाख्या मंदिर के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है। कामरूप सभ्यता की समृद्ध विरासत से जुड़ा यह पवित्र शक्तिपीठ विशाल ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिणी तट पर नीलाचल पहाड़ियों की चोटी पर स्थित है। आज गुवाहाटी भले ही एक आधुनिक शहर के रूप में पहचाना जाता हो, लेकिन कभी कामरूप एक विशाल साम्राज्य था, जिसके अंतर्गत पूर्वी भारत के अनेक क्षेत्र और वर्तमान उत्तरी बांग्लादेश का बड़ा हिस्सा शामिल था।</p>
<p class="isSelectedEnd">माँ कामाख्या मंदिर में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले प्रमुख धार्मिक आयोजनों में अंबुवाची मेला विशेष महत्व रखता है। यह पर्व देश-विदेश से लाखों सनातनी श्रद्धालुओं, साधु-संतों और तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है। इस पवित्र अवसर पर मंदिर का मुख्य द्वार चार दिनों के लिए बंद कर दिया जाता है। इस वर्ष अंबुवाची की &lsquo;प्रवृत्ति&rsquo; 22 जून की दोपहर से शुरू होकर &lsquo;निवृत्ति&rsquo; 26 जून की सुबह तक निर्धारित है।</p>
<p class="isSelectedEnd">धार्मिक मान्यता के अनुसार, अंबुवाची के दौरान धरती माता अपने वार्षिक रजस्वला चक्र से गुजरती हैं। यह काल प्रकृति के विश्राम और सृजन शक्ति के सम्मान का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण इस अवधि में मंदिर में कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं किया जाता। परंपरा के अनुसार, किसान भी इन दिनों खेती-बाड़ी का कार्य स्थगित रखते हैं, ताकि धरती माता को विश्राम मिल सके। देवी के रस्मी स्नान के बाद मंदिर के कपाट पुनः खोले जाते हैं और श्रद्धालु माँ कामाख्या के दर्शन तथा पूजा-अर्चना के लिए बड़ी संख्या में उमड़ पड़ते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">कामाख्या मंदिर को देवी दुर्गा के 51 पवित्र शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि इसका निर्माण कामदेव ने भगवान विश्वकर्मा की सहायता से कराया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राक्षस राजा नरकासुर ने देवी कामाख्या से विवाह करने की इच्छा से मंदिर को पहाड़ी की तलहटी से जोड़ने वाले पत्थर के मार्ग &lsquo;मेखेला उजोवा&rsquo; का निर्माण कराया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">इतिहास में उल्लेख मिलता है कि पश्चिमी असम स्थित कूच बिहार के राजा कालापहाड़ ने वर्ष 1553 ईस्वी में इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। इसके बाद 17वीं शताब्दी में महाराजा विश्व सिंह ने मंदिर के पुनर्निर्माण और मरम्मत का कार्य कराया। उनके निधन के बाद कूच बिहार की गद्दी पर बैठे राजा नर-नारायण ने अपने भाई महावीर चिलाराय की सहायता से मंदिर के ऊपरी हिस्से का निर्माण करवाया। वर्तमान मंदिर और इसके आसपास के क्षेत्र का स्वरूप काफी हद तक नर-नारायण के शासनकाल में विकसित हुआ।</p>
<p class="isSelectedEnd">लोककथाओं के अनुसार, देवी सती शक्ति का ही स्वरूप थीं। राजा दक्ष द्वारा आयोजित महायज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया था। इसके बावजूद सती यज्ञ स्थल पर पहुँचीं, लेकिन वहाँ उनका सम्मान नहीं हुआ। राजा दक्ष द्वारा भगवान शिव का अपमान किए जाने से आहत होकर सती ने यज्ञ स्थल पर ही अपने प्राण त्याग दिए।</p>
<p class="isSelectedEnd">सती की मृत्यु का समाचार सुनकर भगवान शिव क्रोधित हो उठे। वे यज्ञ स्थल पर पहुँचे और दक्ष को दंडित करने के बाद सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर उठाकर तांडव करने लगे। यह तांडव कई दिनों तक चलता रहा और पूरी सृष्टि विनाश के कगार पर पहुँच गई।</p>
<p class="isSelectedEnd">स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सभी देवी-देवताओं ने भगवान विष्णु से हस्तक्षेप की प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने शिव को इस दुःख और क्रोध से मुक्त करने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से सती के पार्थिव शरीर के टुकड़े कर दिए। मान्यता है कि सती के शरीर के 51 भाग पृथ्वी के विभिन्न स्थानों पर गिरे और वे स्थान समय के साथ पवित्र शक्तिपीठों के रूप में पूजित हुए।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसी मान्यता के अनुसार, देवी सती की योनि नीलाचल पहाड़ियों पर उस स्थान पर गिरी थी, जहाँ आज कामाख्या मंदिर स्थित है। संस्कृत के प्राचीन ग्रंथ &lsquo;कालिका पुराण&rsquo; में माँ कामाख्या को भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली देवी के रूप में वर्णित किया गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">कामाख्या मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ देवी की कोई प्रतिमा नहीं है। गर्भगृह में प्राकृतिक गुफा के भीतर स्थित योनि की नक्काशीदार आकृति की पूजा की जाती है। यही इस शक्तिपीठ की आध्यात्मिक पहचान है।</p>
<p class="isSelectedEnd">आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण, प्रकृति के सम्मान और स्त्री-शक्ति की गरिमा की बात कर रही है, तब अंबुवाची मेला भारतीय सभ्यता की उस गहरी संवेदनशीलता को सामने लाता है, जिसमें धरती को माँ, प्रकृति को शक्ति और स्त्रीत्व को सृजन का आधार माना गया है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का आयोजन नहीं, बल्कि धरती, प्रकृति और स्त्री-शक्ति के प्रति सम्मान का जीवंत संदेश भी है।</p>
<p>जय माँ कामेश्वरी।</p>]]></content:encoded>
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