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    <title><![CDATA[Articles by Nava Thakuria | Purvottar Khabar]]></title>
    <link><![CDATA[https://www.purvottarkhabar.in/author/2]]></link>
    <description><![CDATA[Latest multi-category articles and blogs written by Nava Thakuria, published on Purvottar Khabar. Stay informed with trusted insights.]]></description>
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      <title>Articles by Nava Thakuria | Purvottar Khabar</title>
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      <title><![CDATA[CNFF-2026: गुवाहाटी में भारतीय विरासत और देशभक्ति फिल्मों का राष्ट्रीय संगम]]></title>
      <description><![CDATA[<a href="https://www.purvottarkhabar.in/news/cnff-2026-guwahati-indian-heritage-patriotic-films-festival"><img alt="CNFF-2026: गुवाहाटी में भारतीय विरासत और देशभक्ति फिल्मों का राष्ट्रीय संगम" border="0" src="https://www.purvottarkhabar.in/view/june-2026/cnff-guwahati.jpg"></a><p>गुवाहाटी में 24 और 25 अक्टूबर 2026 को चलचित्रम नेशनल फिल्म फेस्टिवल का 10वां संस्करण आयोजित होगा, जिसमें भारतीय विरासत, देशभक्ति और सामाजिक सरोकारों पर आधारित लघु फिल्मों और डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया जाएगा।</p>]]></description>
      <link><![CDATA[https://www.purvottarkhabar.in/news/cnff-2026-guwahati-indian-heritage-patriotic-films-festival]]></link>
      <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 07:13:59 GMT</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[Nava Thakuria]]></dc:creator>
      <category><![CDATA[CNFF2026]]></category>
      <category><![CDATA[चलचतरम नशनल फलम फसटवल]]></category>
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      <content:encoded><![CDATA[<p class="isSelectedEnd"><strong><img src="https://www.purvottarkhabar.in/view/june-2026/cnff-guwahati.jpg"> गुवाहाटी, 28 जून:</strong> पूर्वोत्तर भारत के फिल्म प्रेमियों, समीक्षकों, फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों के लिए 24 और 25 अक्टूबर 2026 विशेष अवसर लेकर आ रहा है। इन दो दिनों में गुवाहाटी देशभक्ति, भारतीय सभ्यता, संस्कृति और विरासत पर आधारित फिल्मों के राष्ट्रीय संगम का साक्षी बनेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd">चलचित्रम नेशनल फिल्म फेस्टिवल (CNFF) का 10वां संस्करण गुवाहाटी के कहिलीपाड़ा स्थित ज्योति चित्रबन फिल्म सोसाइटी परिसर में आयोजित किया जाएगा। इस महोत्सव में चयनित लघु फिल्मों और डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया जाएगा। विश्व संवाद केंद्र-असम की सहयोगी संस्था चलचित्रम द्वारा आयोजित इस राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में प्रतिष्ठित फिल्म हस्तियों, समीक्षकों, फिल्मकारों और फिल्म प्रेमियों की उपस्थिति में चयनित प्रविष्टियों को ट्रॉफी, प्रमाणपत्र और नकद पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे।</p>
<p class="isSelectedEnd">भारतीय चित्र साधना के मार्गदर्शन में शुरू हुए इस महोत्सव की शुरुआत वर्ष 2017 में गुवाहाटी फिल्म फेस्टिवल के रूप में हुई थी। वर्ष 2019 में इसका नाम बदलकर चलचित्रम नेशनल फिल्म फेस्टिवल रखा गया और इसे &lsquo;हमारी विरासत, हमारा गौरव&rsquo; विषय के साथ नया स्वरूप दिया गया।</p>
<p class="isSelectedEnd">CNFF में भारतीय विरासत, स्थानीय समाज, स्वतंत्रता संग्राम के नायक, महाकाव्य और पौराणिक कथाएं, राष्ट्रीय एकता, कला और कलाकार, योग, ध्यान, आयुर्वेद, पांडुलिपियां, चित्रकला, पारिवारिक मूल्य, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, भूमि और जनजीवन, पर्यटन, हस्तशिल्प, वस्त्र उद्योग, लकड़ी की नक्काशी, संगीत, स्थानीय पर्व-त्योहार, पारंपरिक खेल, स्मारक और विरासत स्थल, समाज सुधारक, चाय और तेल उद्योग सहित अनेक विषयों पर आधारित फिल्मों को स्थान दिया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">महोत्सव में पुरस्कार विजेता फिल्मों का चयन कलाकारों, समीक्षकों, फिल्मकारों, लेखकों और अन्य विशेषज्ञों की जूरी द्वारा किया जाएगा। नॉर्थ-ईस्ट इंडिया कैटेगरी में सर्वश्रेष्ठ शॉर्ट फीचर, सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, पटकथा, सिनेमैटोग्राफी और संपादन सहित पांच पुरस्कार दिए जाएंगे। वहीं, ऑल इंडिया कैटेगरी में सर्वश्रेष्ठ शॉर्ट फीचर और सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री के लिए दो पुरस्कार निर्धारित किए गए हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">सभी श्रेणियां पेशेवर और नए फिल्मकारों के लिए समान रूप से खुली हैं। फिल्मों की अवधि 1 से 25 मिनट के बीच होनी चाहिए। इसके साथ ही फिल्मों का निर्माण 1 सितंबर 2025 से 1 सितंबर 2026 के बीच हुआ होना आवश्यक है।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रविष्टियों के लिए अर्ली बर्ड अवधि 10 से 30 जून तक रखी गई है, जिसके लिए कोई शुल्क नहीं होगा। रेगुलर डेडलाइन 1 से 20 जुलाई तक है, जिसके लिए 500 रुपये शुल्क निर्धारित है। फाइनल डेडलाइन 20 जुलाई से 2 सितंबर तक रहेगी, जिसके लिए 1,000 रुपये शुल्क देना होगा। प्रविष्टियां सीधे CNFF कार्यालय के ई-मेल <a href="mailto:chalachitramne@gmail.com">chalachitramne@gmail.com</a> या FilmFreeway के माध्यम से भेजी जा सकती हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">देशभर में आयोजित विभिन्न राष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों के बीच CNFF ने अपनी अलग पहचान बनाई है। यह आयोजन भारतीयता, सामाजिक प्रतिबद्धता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को सिनेमा के माध्यम से सामने लाने का एक प्रभावी मंच बन चुका है। पूर्वोत्तर भारत में यह महोत्सव विशेष रूप से उन फिल्मकारों को अवसर देता है, जो स्थानीय समाज, इतिहास, संस्कृति और जनजीवन से जुड़े विषयों को राष्ट्रीय पटल पर लाना चाहते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">पिछले यानी 9वें CNFF का उद्घाटन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के असम क्षेत्र प्रचार प्रमुख सुनील मोहंती ने भारत माता तथा डॉ. भूपेन हजारिका, जुबीन गर्ग और दीपक शर्मा के चित्रों के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया था। इस संस्करण में प्रतियोगिता और गैर प्रतियोगिता श्रेणी में 30 से अधिक लघु फीचर फिल्मों और डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया गया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">इन फिल्मों में वृद्धावस्था का अकेलापन, जीवन का उद्देश्य, मृत्यु की नई व्याख्या, परिवार के साथ शांतिपूर्ण जीवन की तलाश, आधुनिक जीवन के आकर्षण और भ्रम, पर्यावरण, भारत की हजारों वर्षों पुरानी सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत तथा अनेक समकालीन विषयों को संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया गया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">कुछ फिल्मों में शहरी क्षेत्रों में अकेले रह रहे बुजुर्ग पेशेवरों की चुनौतियों, लोककथाओं और लोकगीतों के माध्यम से मानसिक संबल, कमजोर होते पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक तनावों को रेखांकित किया गया। कई फिल्मों ने जाति आधारित सामाजिक संरचना और सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्षरत वंचित समुदायों की चुनौतियों को भी प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।</p>
<p class="isSelectedEnd">कुछ प्रविष्टियों ने धीमी गति से सीखने वाले और दिव्यांग बच्चों की दुनिया से दर्शकों को परिचित कराया। इसके माध्यम से उनके जीवन के भावनात्मक और संवेदनशील पहलुओं को समझने का अवसर मिला। मातृसत्तात्मक समाज में विवाह के बाद पुरुषों द्वारा अपना पैतृक परिवार छोड़ने की परंपरा, जादू-टोने से जुड़ी प्राचीन मान्यताएं, असम की पारंपरिक धागे वाली कठपुतली कला, भारत के प्राचीन वस्त्र उद्योग की विरासत और आधुनिक तकनीक से उत्पन्न चुनौतियां भी दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहीं।</p>
<p class="isSelectedEnd">कुछ फिल्मों में बदलती मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के कारण परिवार और रिश्तों से दूर होते युवाओं की समस्याओं को भी सामने रखा गया। साथ ही यह सकारात्मक संदेश भी दिया गया कि परिवार के निस्वार्थ प्रेम और स्नेह से युवा फिर से आत्मविश्वास प्राप्त कर सकते हैं और समाज के प्रति जिम्मेदारी तथा अपनत्व की भावना के साथ अपनी शिक्षा और भविष्य के करियर की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।</p>
<p>समापन समारोह में तत्कालीन असम विधानसभा अध्यक्ष बिस्वजीत दैमारी, अनेक फिल्म हस्तियां, गणमान्य अतिथि और बड़ी संख्या में फिल्म प्रेमी उपस्थित रहे थे। आयोजन समिति की ओर से विश्व संवाद केंद्र-असम के सचिव किशोर शिवम और CNFF के सचिव भगवत प्रीतम ने आशा व्यक्त की कि यह महोत्सव उभरते फिल्मकारों को सिनेमा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन, वंचित वर्गों के सशक्तिकरण और देशभक्ति की भावना को पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में सुदृढ़ करने के लिए प्रेरित करता रहेगा।</p>]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अंबुवाची मेला: धरती, प्रकृति और स्त्री-शक्ति का पवित्र पर्व]]></title>
      <description><![CDATA[<a href="https://www.purvottarkhabar.in/news/ambubachi-mela-kamakhya-temple-prakriti-stree-shakti"><img alt="अंबुवाची मेला: धरती, प्रकृति और स्त्री-शक्ति का पवित्र पर्व" border="0" src="https://www.purvottarkhabar.in/view/june-2026/ambubachi-mela-in-kamakhya.jpg"></a><p>गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर में मनाया जाने वाला अंबुवाची मेला धरती माता, प्रकृति और स्त्री-शक्ति के प्रति भारतीय सभ्यता की आस्था और संवेदनशीलता का प्रतीक है।</p>]]></description>
      <link><![CDATA[https://www.purvottarkhabar.in/news/ambubachi-mela-kamakhya-temple-prakriti-stree-shakti]]></link>
      <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 06:59:39 GMT</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[Nava Thakuria]]></dc:creator>
      <category><![CDATA[अबवच मल]]></category>
      <category><![CDATA[कमखय मदर]]></category>
      <category><![CDATA[म कमखय]]></category>
      <category><![CDATA[गवहट]]></category>
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      <content:encoded><![CDATA[<p><img src="https://www.purvottarkhabar.in/view/june-2026/ambubachi-mela-in-kamakhya.jpg">&nbsp;</p>
<p class="isSelectedEnd">भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थित गुवाहाटी आने वाले लाखों श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों की यात्रा माता कामाख्या मंदिर के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है। कामरूप सभ्यता की समृद्ध विरासत से जुड़ा यह पवित्र शक्तिपीठ विशाल ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिणी तट पर नीलाचल पहाड़ियों की चोटी पर स्थित है। आज गुवाहाटी भले ही एक आधुनिक शहर के रूप में पहचाना जाता हो, लेकिन कभी कामरूप एक विशाल साम्राज्य था, जिसके अंतर्गत पूर्वी भारत के अनेक क्षेत्र और वर्तमान उत्तरी बांग्लादेश का बड़ा हिस्सा शामिल था।</p>
<p class="isSelectedEnd">माँ कामाख्या मंदिर में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले प्रमुख धार्मिक आयोजनों में अंबुवाची मेला विशेष महत्व रखता है। यह पर्व देश-विदेश से लाखों सनातनी श्रद्धालुओं, साधु-संतों और तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है। इस पवित्र अवसर पर मंदिर का मुख्य द्वार चार दिनों के लिए बंद कर दिया जाता है। इस वर्ष अंबुवाची की &lsquo;प्रवृत्ति&rsquo; 22 जून की दोपहर से शुरू होकर &lsquo;निवृत्ति&rsquo; 26 जून की सुबह तक निर्धारित है।</p>
<p class="isSelectedEnd">धार्मिक मान्यता के अनुसार, अंबुवाची के दौरान धरती माता अपने वार्षिक रजस्वला चक्र से गुजरती हैं। यह काल प्रकृति के विश्राम और सृजन शक्ति के सम्मान का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण इस अवधि में मंदिर में कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं किया जाता। परंपरा के अनुसार, किसान भी इन दिनों खेती-बाड़ी का कार्य स्थगित रखते हैं, ताकि धरती माता को विश्राम मिल सके। देवी के रस्मी स्नान के बाद मंदिर के कपाट पुनः खोले जाते हैं और श्रद्धालु माँ कामाख्या के दर्शन तथा पूजा-अर्चना के लिए बड़ी संख्या में उमड़ पड़ते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">कामाख्या मंदिर को देवी दुर्गा के 51 पवित्र शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि इसका निर्माण कामदेव ने भगवान विश्वकर्मा की सहायता से कराया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राक्षस राजा नरकासुर ने देवी कामाख्या से विवाह करने की इच्छा से मंदिर को पहाड़ी की तलहटी से जोड़ने वाले पत्थर के मार्ग &lsquo;मेखेला उजोवा&rsquo; का निर्माण कराया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">इतिहास में उल्लेख मिलता है कि पश्चिमी असम स्थित कूच बिहार के राजा कालापहाड़ ने वर्ष 1553 ईस्वी में इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। इसके बाद 17वीं शताब्दी में महाराजा विश्व सिंह ने मंदिर के पुनर्निर्माण और मरम्मत का कार्य कराया। उनके निधन के बाद कूच बिहार की गद्दी पर बैठे राजा नर-नारायण ने अपने भाई महावीर चिलाराय की सहायता से मंदिर के ऊपरी हिस्से का निर्माण करवाया। वर्तमान मंदिर और इसके आसपास के क्षेत्र का स्वरूप काफी हद तक नर-नारायण के शासनकाल में विकसित हुआ।</p>
<p class="isSelectedEnd">लोककथाओं के अनुसार, देवी सती शक्ति का ही स्वरूप थीं। राजा दक्ष द्वारा आयोजित महायज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया था। इसके बावजूद सती यज्ञ स्थल पर पहुँचीं, लेकिन वहाँ उनका सम्मान नहीं हुआ। राजा दक्ष द्वारा भगवान शिव का अपमान किए जाने से आहत होकर सती ने यज्ञ स्थल पर ही अपने प्राण त्याग दिए।</p>
<p class="isSelectedEnd">सती की मृत्यु का समाचार सुनकर भगवान शिव क्रोधित हो उठे। वे यज्ञ स्थल पर पहुँचे और दक्ष को दंडित करने के बाद सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर उठाकर तांडव करने लगे। यह तांडव कई दिनों तक चलता रहा और पूरी सृष्टि विनाश के कगार पर पहुँच गई।</p>
<p class="isSelectedEnd">स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सभी देवी-देवताओं ने भगवान विष्णु से हस्तक्षेप की प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने शिव को इस दुःख और क्रोध से मुक्त करने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से सती के पार्थिव शरीर के टुकड़े कर दिए। मान्यता है कि सती के शरीर के 51 भाग पृथ्वी के विभिन्न स्थानों पर गिरे और वे स्थान समय के साथ पवित्र शक्तिपीठों के रूप में पूजित हुए।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसी मान्यता के अनुसार, देवी सती की योनि नीलाचल पहाड़ियों पर उस स्थान पर गिरी थी, जहाँ आज कामाख्या मंदिर स्थित है। संस्कृत के प्राचीन ग्रंथ &lsquo;कालिका पुराण&rsquo; में माँ कामाख्या को भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली देवी के रूप में वर्णित किया गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">कामाख्या मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ देवी की कोई प्रतिमा नहीं है। गर्भगृह में प्राकृतिक गुफा के भीतर स्थित योनि की नक्काशीदार आकृति की पूजा की जाती है। यही इस शक्तिपीठ की आध्यात्मिक पहचान है।</p>
<p class="isSelectedEnd">आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण, प्रकृति के सम्मान और स्त्री-शक्ति की गरिमा की बात कर रही है, तब अंबुवाची मेला भारतीय सभ्यता की उस गहरी संवेदनशीलता को सामने लाता है, जिसमें धरती को माँ, प्रकृति को शक्ति और स्त्रीत्व को सृजन का आधार माना गया है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का आयोजन नहीं, बल्कि धरती, प्रकृति और स्त्री-शक्ति के प्रति सम्मान का जीवंत संदेश भी है।</p>
<p>जय माँ कामेश्वरी।</p>]]></content:encoded>
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